यही वह खूबसूरती है जिसे अटल जी देखना चाहते थे और जिसमें वो जीते थे। विपक्ष के इन दो चहरों को अटल जी के अंतिम संस्कार के समय प्रधानमंत्री के साथ पहली पंक्ति में जगह दी गई।
जबकि 2014 के बाद अबतक आने वाली 26 जनवरी के समय ऐसा नहीं देखा गया। दिल्ली मेट्रो की मैजंटा लाइन के नोएडा से उद्घाटन के समय दिल्ली के मुखिया केजरीवाल को नहीं बुलाया गया। खुद पीएम मोदी और यूपी के सीएम योगी ने मेट्रो को हरी झंडी दिखा दी। जबकि अटल जी के समय जब दिल्ली मेट्रो का दिल्ली में आगाज हुआ तो उन्होंने न सिर्फ लाइन में लग कर टोकन लिया। दिल्ली की उस वक्त की मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता शीला दीक्षित के साथ मेट्रो की पहली यात्रा भी की।
अटल विदाई की इस बेला पर विपक्ष को उचित सम्मान मोदी सरकार का स्वागत योग्य कदम है। हमें उम्मीद करनी चाहिए आगे भी ये सिलसिला चलती रहे तभी अटल जी के कथन अनुसार इस देश का लोकतंत्र अमर रह पाएगा। लेकिन उग्र कार्यकर्ताओं का भाजपा दफ्तर के बाहर अग्निवेश पर हमला अटल विचारधारा के खिलाफ है। हमारे यहां तो घर आए दुश्मन का भी मेहमान की तरह स्वागत होता है। ये उग्र कार्यकर्ता किस तरह के भारत का निर्माण करना चाहते हैं।
इन सब बातों से अलग विपक्ष के चहरे के रूप में अंतिम संस्कार पर मौजूद राहुल गांधी ने अपनी चुलबुली हरकतों से अपने आप को एक बार फिर साबित कर दिया कि वो राजनीति के पप्पू ही हैं। दुख की इस घड़ी में राहुल बाबा न जाने आसमां की तरफ क्या देखकर मंद मंद मुस्करा रहे थे। हो सकता है अटल जी की आत्मा से बात कर रहे हों। कभी कभी लगता है ये आदमी सचमुच बचपन में जी रहा है और अपने दादा मनमोहन के साथ नई जगह आकर उत्साहित होकर इधर उधर उन चीजों को देख रहा है जो उसने जीवन में पहले कभी नहीं देखी।
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