महिलाएं ही क्यों कर रही हैं, महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का विरोध

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Photo : Google

ज्योति चौधरी

सुप्रीम कोर्ट के सभी उम्रवर्ग की महिलाओं को प्रवेश देने वाले हालिया फैसले के बाद इस मंदिर को पहली बार आज शाम 5 बजे खोला जाएगा। लेकिन आंदोलनकारी महिलाओं द्वारा अन्य महिलाओं को मंदिर में जाने से रोका जा रहा हैं। इस आन्दोलनकर्ताओ में पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाये भी शामिल है। एक आंदोलनकारी महिला ने कहा कि 10 से 50 साल आयु वर्ग की महिलाओं को निलाकल से आगे नहीं जाने दिया जाएगा और उन्हें मंदिर में पूजा भी नहीं करने दी जाएगी। यदि ऐसा होगा तो अगले दिन वो किसी पेड़ ने लटकी नज़र आएंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला महिलाओं के हक़ में सुनाया है। उसके बावजूद भी कुछ महिलाये इस फैसले के खिलाफ है। क्योंकि वहां की महिलाओं का मानना है कि यह उनकी धार्मिक भावानाओं के खिलाफ है। प्रत्येक धर्म की अपनी परंपरा और मान्यताएं है जिसका फैसला कोई भी कोर्ट या कानून नहीं ले सकता। वहां की महिलाओं का मानना है कि केरल के सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा विराजमान है जोकि बहुत ही ब्रह्मचारी है। यदि 10-50 उम्र की महिलाओं को प्रवेश दिया जाएगा तो यह मंदिर की पवित्रता को खंडित करना होगा।

केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश से पहले 41 दिन तक के कठोर व्रत का नियम है। लेकिन मासिक धर्म के चलते महिलाएं लगातार 41 दिन का व्रत नहीं कर सकती हैं। इसलिए 10-50 साल की महिलाओं को मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं थी। पश्चिमी घाट की पर्वत श्रृंखला पर स्थित ये मंदिर श्रद्धालुओं के बीच बेहद पवित्र माना जाता है और देशभर से लोग इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं।

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया था कि सबरीमला मंदिर में हर उम्र की महिलाएं जा सकती हैं। इससे पहले मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को एंट्री की इजाजत नहीं थी।

मंदिर में महिलाओं को प्रवेश का हक देने के लिए लड़ी लंबी लड़ाई

1990 में एस महेंद्रन ने केरल हाईकोर्ट में मंदिर में महिलाओं को प्रवेश देने को लेकर याचिका दायर की थी।

1991 में केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 साल की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर रोक नहीं लगाया और इसे बरकरार रखा।

2006 सुप्रीम कोर्ट में इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने औरतों के मंदिर में बैन को हटाने के लिए याचिका दायर की। ये याचिका इस आधार पर फाइल की गई कि ये नियम भारतीय संविधान की धारा 25 का उल्लंघन करता है जिसके तहत धर्म को मानने और प्रचार करने की आजादी मिलती है।

नवंबर 2007: केरल में लेफ्ट सरकार ने महिलाओं की एंट्री पर बैन लगाने के सवाल को समर्थित करने की जनहित याचिका पर एक एफिडेविट फाइल किया।

जनवरी 2016: सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर बैन की प्रैक्टिस पर सवाल उठाए।

7 नवंबर 2016: लेफ्ट सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया कि वो सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश दिलाने के पक्ष में है।

13 अक्टूबर 2017: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश देने संबंधी केस को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को भेजा गया।

26 जुलाई 2017: पंडालम राज परिवार ने महिलाओं के प्रवेश को लेकर डाली गई याचिका को चुनौती दी। उन्होंने इसे हिंदू आस्था के खिलाफ बताया। उनकी तरफ से वकील ने कोर्ट में बताया कि मंदिर के देवता भगवान अयप्पा शाश्वत ब्रह्मचारी हैं लिहाजा पीरियड्स के दौर से गुजरी रही महिलाओं को मंदिर के प्रांगण में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए।

28 सितंबर 2018: सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी दे दी। महिलाओं को रोकने संबंधी कानून आर्टिकल 25 (क्लॉज 1) और रूल 3 (बी) का उल्लंघन करता है।

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