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Dastak India > Home > देश > अब न पत्रकारिता बची है न ही संस्थान- पुण्य प्रसून बाजपेयी
देशराजनीतिविचार

अब न पत्रकारिता बची है न ही संस्थान- पुण्य प्रसून बाजपेयी

dastak
Last updated: March 26, 2018 4:18 pm
dastak
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दिल्ली में दिवंगत पत्रकार आलोक तोमर की याद में आयोजित एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। चर्चा का विषय था “सत्यातीत पत्रकारिता” अंग्रेजी में पोस्ट ट्रुथ। जब कार्यक्रम में पुण्य प्रसून वाजपेयी का बोलने का समय आया तो उन्होंने अपनी बात “इस बहस से ऐसा लग रहा है कि पोस्ट ट्रुथ नहीं पोस्ट मोदी होना चाहिए था”। वाजपेयी ने गोदी मीडिया की पोल खोलते हुए पहले तो टीआरपी के खेल को बताया। वाजपेयी ने कहा कि हम एक ऐसे दौर में हैं जिसमें पत्रकारिता नहीं हो रही है और हम यहां पत्रकारिता के लिए यहां चर्चा कर रहे हैं। बहुत सारी ऐसी स्थितियों के बीच हम आकर ठहर से गए हैं जिसमें मौजूदा वक्त को देखें, अतीत को देखें या भविष्य को देखें। राडिया पेपर हमारे पास सबसे पहले आने वाला था। एक महीने तक पेपर घुमता रहा। किसी की हिम्मत नहीं हुई छापने की। तमाम जगह पर प्रयास करने के बावजूद वो छप नहीं पाया। जिसके बाद वो पेपर छोटे अखबार ने छापने की हिम्मत दिखाई। एक वो दौर था। सहारा पेपर भी सबसे पहले हमारे पास आया। लेकिन वो पेपर भी मीडिया में सामने नहीं आया। इस दौर में फिर भी पत्रकारिता करनी है, पत्रकारिता का झंडा बुलंद करने के नाम पर करनी है। तो एक किस्सा तो ये है कि पत्रकारिता हो नहीं रही है। लेकिन हम सोशल मीडिया को दोष नहीं दे सकते हैं। वाजपेयी ने कहा कि हम कहते हैं कि देश में लोकतंत्र है ही नहीं। तभी हम कहेंगे कि हम चौथा स्तंभ नहीं है।

उन्होंने मोदी सरकार पर बोलते हुए कहा कि मौजूदा वक्त में डराया जाता है। कांग्रेस के वक्त में एडवाइजरी दी जाती थी। संपादकों को बुलाया जाता था। आज कि स्थिती में फोन कर दिया जाता है। वो फोन किसी भी जगह से आ सकता है। वो सुचना एंव प्रसारण मंत्रालय से आ सकता है, प्रधानमंत्री कार्यालय से आ सकता है या फिर बीजेपी मुख्यालय से आ सकता है। कांग्रेस के समय की बात करते हुए बाजपेयी कहते हैं कि उस समय चीजें बरती जा रही थी कि एडवाईजरी देनी है, संपादकों को बुलाना है लेकिन दिखाया उस दौर में भी नहीं जाता था। लेकिन आज की तारीख में सीधा बोल दिया जाता है। तो क्या आज की तारीख में ये मान लिया जाए की संस्थान कोई भी नहीं बचा है और हम उसके बाद बहस कर रहे हैं कि एक पत्रकारिता है जो चौथा स्तंभ है, जो लोगों की आवाज है। लेकिन असल में कोई संस्थान है ही नहीं और न ही कोई संस्थान काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि कोई भी संस्था नहीं बची है। चाहे वो शैक्षणिक संस्थान ही क्यों न हो।

उन्होंने इशारे इशारे में संघ पर सवाल करते हुए कहा कि ” एक वो तबका जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं था न ही पीएम न ही सरकार, न ही पत्रकार। लेकिन वो भीड के रुप में मौजूद था। झटके से आपने उसको मान्यता दे दी। गले में मेरे भगवा हो और मैं थाने चला जाऊ तो एफआईआर दर्ज होगी ही। उन्होंने कहा कि अमेरिका में अगर ट्रंप के खिलाफ लोग खडे हैं तो वहां संस्थाएं बची हुई हैं। यहां पर नहीं बच रही। अगर संस्थान नहीं है तो लोकतंत्र नहीं है। आपके जहन में जो चल रहा है वो आप लिखते नहीं है और जो आप लिखते हैं वो कहते नहीं हैं। फिर भी देश चल रहा है। तो न्यूज चैनलों में भी कुछ इसी तरह हो रहा है। बडे बडे संस्थानों में भले ही पत्रकार गलत जानकारी दे रहा हो, लेकिन अगर उससे टीआरपी आ जाए तो फिर भी उस पत्रकार की नौकरी बची रह जाती है। उन्होंने कहा कि हमें वो रास्ता खोजना होगा। जिसके जरिए पत्रकारों को न्यूज चैनल चलाने का लाईसेंस मिल जाए। ये प्रयास हम कांग्रेस के जमाने से प्रयास कर रहे हैं। वाजपेयी ने कहा कि राजनैतिक सत्ता के आगे कोई दुनिया नहीं है। अगर आप ये मानते हैं कि है तो आप भ्रम में हैं। ये बात संयोग से बीते चार वर्ष में साफ हो गया है। उन्होंने कहा कि चुनाव से लोकतंत्र नहीं आएगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि एक सेक्रेटरी लेवल के अधिकारी ने न्यूज़रूम में फोन कर पूछा कि फलां तथ्य या फलां जानकारी आपको कहां से मिली। इस ख़बर का सोर्स क्या था। मैं उस अधिकारी को सोर्स और जानकारी के बारे में बताता हूं। इसपर पुण्य प्रसून ने ही तंज किया कि इसका मतलब है कि सेक्रेटरी भी अपना काम नहीं कर रहा है, सिर्फ टीवी ही देख रहा है।

पुण्य प्रसून की पूरी स्पीच देखें-

https://www.youtube.com/watch?v=RHSNqWXYQsg

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