रिजर्व बैंक से 50 अरबपतियों का 68 हजार करोड़ माफ पर लाखों मजदूरों के लिए?

ज़रा सोचिए कितने प्रवासी मजदूर होंगे देश में? सबसे ज्यादा बिहार के हैं 18 लाख और पूरे देश का जोड़ लें तो ये आंकड़ा अनुमानित 50 लाख तक पहुंच सकता है। एक मजदूर का ट्रेन किराया औसतन 1000 रुपये भी जोड़ लें तो कुल खर्च बैठता है 500 करोड़।

Updated On: May 10, 2020 22:15 IST

Dastak

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प्रमेंद्रा मोहन

सबके अपने-अपने हैं आसमां, और सबने पाल रखे हैं गिद्ध, पहले मारेंगे फिर नोच खाएंगे, कोई क्या कहे जब ये बात है सिद्ध।

मजदूरों को जाहिल गंवार कहा गया-

...दिल्ली में जब भूखे मजदूर सड़कों पर उमड़े तो कहा गया कि ये जाहिल-गंवार हैं क्योंकि केजरी किचेन में 3 लाख मजदूरों का खाना पक रहा था..कुछ लोग 5-10 मजदूरों का फोटो-वीडियो भी ले आए कि तैयारी है पूरी..कहीं नहीं कोई मज़बूरी! मुंबई में मजदूर जब बांद्रा में उमड़े तो कहा गया कि ये मजदूर नहीं जमाती हैं..मुसीबत के बाराती हैं..उद्धव सरकार तो सबको भरपूर खिला रही है..लेकिन इनको घर जाने की जिद पड़ी है..यूपी में जब मजदूरों को बैठा कर कीटनाशक का छिड़काव किया गया तो कहा गया कि सरकार तो संवेदनशील हैं लेकिन कहां-कहां नज़र रखे..बिहार के मजदूरों पर लिखा तो कहा गया कि भला लॉकडाउन में आना-जाना..जहां हैं वहीं रहे, बिहार में कहां हैं इंतजाम...कर्नाटक में बिहारी मजदूरों को लाने वाली ट्रेन बिल्डर लॉबी के दबाव में रोकी गई तो कहा गया कि वो तो झगड़ा कर रहे थे..औरंगाबाद में मजदूर कटे तो कहा गया कि वो तो मूर्ख थे भला पटरी पर कोई सोता है?...सब बढ़िया है भाई...लेकिन कोई पूछो कि ऐसा इनके साथ ही क्यों होता है? तो भैया ये तय पाया गया कि कोई कुछ भी न बोलो...सारा दोष रोटी का है..सरकारें, पार्टियां, भक्त-चमचे-चाटुकार सब कह ही रहे हैं कि मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए..और सब कर भी रहे हैं मौत पर राजनीति.. अपने वाले को बचाने और दूसरों पर थोपने की राजनीति और जहां दूसरे न मिलें वहां मजदूरों पर ही सारा ठीकरा फोड़ कर खुद को यथार्थवादी ठहराने की राजनीति..

50 अरबपतियों के लिए रिजर्व बैंक राइट ऑफ कर सकता है पर मजदूरों के लिए?

ज़रा सोचिए कितने प्रवासी मजदूर होंगे देश में? सबसे ज्यादा बिहार के हैं 18 लाख और पूरे देश का जोड़ लें तो ये आंकड़ा अनुमानित 50 लाख तक पहुंच सकता है। एक मजदूर का ट्रेन किराया औसतन 1000 रुपये भी जोड़ लें तो कुल खर्च बैठता है 50,00,000x1000=5,00,00,00,000 रुपये यानी 500 करोड़। अभी 68 हजार करोड़ राइट ऑफ किया है ना रिजर्व बैंक ने, उसमें अगर ये 500 करोड़ जोड़ दें तो क्या नामुमकिन है? जब 50 अरबपतियों का 68 हजार करोड़ राइट ऑफ हो सकता है तो 50 लाख मजदूरों के लिए 500 करोड़ नहीं हो सकता? जिस राज्य के ये मजदूर थे, वहां के दोनों दलों के विधायकों को बैंगलुरू से लेकर राजस्थान तक के रिसॉर्ट्स में ठहराया, लाया-ले जाया जा रहा था या नहीं? डील कितने सौ करोड़ में हुई या सूखा-सूखी हृदय परिवर्तन हो गया, ये व्यक्तिगत या पार्टीगत मामला है, लेकिन इनका पांचसितारा राजसी ख्याल रखा गया, ये तो सार्वजनिक है ना? तो फिर सारी परेशानी मजदूरों को घर लाने भर में ही है? वैसे राइट ऑफ वाले में न भी डालें तो जिस-जिसने कहा है कि वो मजदूरों का ट्रेन किराया देने को तैयार हैं, सब अपने-अपने ट्वीटर हैंडल पर डिटेल्स डालें कि कौन मजदूरों के लिए कितना पैसा खर्च करने को तैयार है? कुल अनुमानित खर्च मैने बता ही दिया है। वैसे भी राज्यों का दावा है कि वो अपने मजदूरों को लाने के लिए तैयार हैं, भेजने वाले राज्यों से तालमेल करके लाने का भी दावा है, तो क्यों नहीं भेजे जा रहे? केंद्र भी तैयार, राज्य भी तैयार, सत्तापक्ष भी तैयार, विपक्ष भी तैयार, टिकट के लिए पैसे भी तैयार तो फिर ट्रेनें क्वारंटीन में हैं क्या?

अपने एक्टीविस्टों के जरिए माहौल बनाने में जुटे हैं राजनीतिक दल-

अजीब स्यापा मचा कर रखा हुआ है सबने...इन राजनीतिक दलों को पता है कि संवेदनहीनों का देश है तो अपने एक्टिविस्ट्स के जरिये अपने-अपने पक्ष में माहौल बनवाने में सब जुटे हैं...मैं केंद्र औऱ सभी राज्य सरकारों से आग्रह करता हूं कि वो अपने-अपने क्षेत्र की तमाम कंपनियों, फैक्ट्रियों से फरवरी, मार्च और अप्रैल..इन 3 महीनों का सैलरी रोस्टर मंगाएं...और जानकारी सार्वजनिक करें कि फरवरी में कितने कामगारों को पेमेंट हुआ, मार्च में कितनों का और अप्रैल में कितनों का? उतर जाएंगे बड़े-बड़े सियासी आकाओं के मुखौटे जो ये दावे कर रहे हैं कि लॉकडाउन में भी सबको पैसे मिलते रहे हैं। पूछेगा केंद्र और राज्यों की सरकारों से कोई ये सवाल?

बहुत आसान है उनको कोस लेना, जिनके लिए बोलने वाला कोई न हो और इससे भी आसान है उनकी जुबान जबरन बंद कराने की कोशिश करना जो गरीबों-मजदूरों के लिए बोल दे। इतना आसान कि अगर किसी कांग्रेस-आप-विपक्षी गठबंधन सरकार के खिलाफ बात जाती दिखे तो उसे भक्त ठहरा दो और अगर कोई केंद्र या किसी बीजेपी शासित राज्य के खिलाफ जाती दिखे तो कांग्रेसी ठहरा दो...अगर दोनों ही फिट न हो तो मजदूरों पर बोलने वाले को वामिया तो ठहरा ही सकते हैं...और ज्यादा तीखा बोल रहा हो तो फिर देशद्रोही का भी ऑप्शन है ही। ये संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है..कोई आम भारतीय क्यों राजनीति करेगा? क्या 2024 आ गया जो चुनाव का माहौल बनाना है? क्या विश्वासमत में सरकार गिरने जा रही है जो विपक्षियों के पक्ष में हवा बनानी है? दलभक्ति की भी सीमा होनी चाहिए या मजबूर मजदूरों की मौत पर भी राजनीति करके ये धमकी देनी चाहिए कि ख़बरदार किसी ने हमारे आका के खिलाफ में जाने वाली कोई बात लिखी तो फिर जवाब मिलेगा? अगर इन दलभक्तों में संवेदना होती तो जवाब हम जैसों से नहीं बल्कि जवाबदेहों से मांगते ना कि मजदूरों की मौत से सनते उनके कुर्ते के छींटे धोने के लिए थोथे दलीलों के जहरीले वाण चलाते।

रोटी की जरुरत ही मजदूरों को घर से दूर ले गई थी-

ये जो मजदूरों की अफरा-तफरी मची है ना..न उनके पीछे कोई खड़ा है, न उनके साथ कोई खड़ा है। आपने औरंगाबाद हादसे के चश्मदीदों का बयान सुने हैं ना..कोई मजदूरों को मारकर पटरी पर फेंक नहीं गया था। वो खुद पैदल इसलिए आ रहे थे क्योंकि जहां वो थे, वहां और ज्यादा वक्त तक रहने लायक न राशन था, न पैसे थे..बीच-बीच में स्टेशन से पानी भी मिलना था..और ट्रेनें बंद हैं तो कोई रोक-टोक भी नहीं..ट्रैक पर बिखरी उनकी रोटियां फेसबुकिये ज्ञानी खाने से भी कतराएं, लेकिन उनके लिए ये ज़िंदगी थी। ये रोटी ही उन्हें घर से दूर ले गई थी और ये रोटी ही उन्हें दुनिया से भी दूर ले गई और ये रोटी ही देने में सारी की सारी पार्टियां, सरकारें नाकाम रही हैं। ये सब असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं, जिनकी तादाद लाखों में है, लेकिन जिनकी आवाज़ उठाने वाला कोई देशभक्त-देशद्रोही यूनियन नहीं, कोई मीडिया नहीं, कोई दल नहीं और अब तो दलों में बंटे लोग भी नहीं तो फिर इनकी नियती ही यही थी..लेकिन धन्यवाद सरकारों का, जो इतनी संवेदनशील हैं कि उनके परिवारों को इतना मुआवज़ा देने जा रही है, जितना ये ज़िंदा रहकर भी शायद ज़िंदगी भर न कमा पाते..यही तो सकारात्मकता चाहिए..तो लीजिए हम भी दिल से कह देते हैं वाह-वाह सरकार..इतना दिली जन सरोकार।

उपरोक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वो ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी और आजतक आदि संस्थानों में अहम पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

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