सीरिया में बशर अल-अशद चौथी बार बने राष्ट्रपति, अमेरिका एवं यूरोप देशों ने चुनाव को कहा लोकतंत्र की हत्या

सीरिया में एक बार फिर राष्ट्रपति अल असद की ही वापसी हुई है, उन्हें चौथी बार 95.1 प्रतिशत मतों का भारी बहुमत मिला है। विपक्ष ने इस चुनाव को पाखंड करार दिया है।

Updated On: May 29, 2021 10:30 IST

Dastak

Photo Source- Social Media

जावेद इकबाल

सीरिया में एक बार फिर राष्ट्रपति अल असद की ही वापसी हुई है, उन्हें चौथी बार 95.1 प्रतिशत मतों का भारी बहुमत मिला है। जबकि उनके विपक्षी उम्मीदवारों में से महमूद अहमद को 3.3 और अब्दुल्ला को 1.5 प्रतिशत मत ही मिल पाए हैं। पूरे विपक्ष ने इस चुनाव को पाखंड करार दिया है। इस चुनाव में 1.8 करोड़ से अधिक लोगों के अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है। चुनावी खबरों के मुताबिक विद्रोही और कुर्द बलों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में मतदान नहीं हो सका है। अनुमान के मुताबिक करीब 80 लाख लोग अपने मताधिकारों क प्रयोग नहीं कर पाए हैं। साथ ही इस चुनाव में 50 लाख के करीब शरणार्थियों ने भी अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया है।

विपक्ष ने इस चुनाव को मात्र एक पाखंड करार दिया है। उन्होंने कहां की चुनाव में असद को ईरान और रूस का साथ मिलने के कारण उन्होंने इसमें षड्यंत्र किया है और चुनाव जीत लिया है। दूसरी तरफ अमेरिका एवं यूरोप के देशों ने भी इस चुनाव को लोकतंत्र की हत्या करार दिया है। ध्यान रहे कि बशर अल असद अमेरिका के धुर विरोधी रहे हैं, वे समय-समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि सीरिया में अशांति फैलाने और यहां के असामाजिक तत्वों को हथियार मुहैया कराने में अमेरिका का हाथ रहा है।

असद वर्ष 2000 से ही सीरिया के राष्ट्रपति बने हुए हैं। इससे पहले उनके पिता हाफिज अल असद ने सीरिया पर एक चौथाई सदी से ज्यादा वक्त तक के लिए राज किया है। सीरिया में इससे पहले 2014 में चुनाव हुए थे, तब यहां गृह युद्ध छिड़ा हुआ था। विपक्ष ने इस चुनाव में भाग नहीं लिया था, इस चुनाव के बाद से ही लड़ाई का पलडा राष्ट्रपति असद के पक्ष में झुक गया था। तब सीरिया की मदद के लिए रूस और ईरान आगे आए थे। रूस ने हवाई हमलों से साथ दिया था तो ईरान ने अपने समर्थन वाली मिली शिया को मदद के लिए भेजा था।

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गौरतलब है कि सीरिया सुन्नी बहुल क्षेत्र है, लेकिन यहां पर काफी लंबे समय से सत्ता शियाओं के हाथ में रही और शिया देशों का सुप्रीम ईरान को माना जाता है। जिसे रूस की मदद मिलती है, सीरियाई सरकार ने चुनाव ऐसे समय करवाएं हैं जब वह संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में एक नए संविधान का प्रारूप बनाने के लिए लगा है। इसका मकसद UN की निगरानी में वहां स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को संभव बनाना है। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि यूएन ने भी इस चुनाव के परिणाम पर सवाल उठाएं, ऐसे में कहना बहुत मुश्किल होगा कि चुनाव के परिणाम का यहां बहुत असर पड़ेगा। क्योंकि सीरिया का आज भी बहुत बड़ा क्षेत्र ऐसा है जहां पर विद्रोहियों जिहादियों और कुर्द के नेतृत्व वाली सेना का नियंत्रण है।

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