राजनीतिक अस्थिरता के बीच नेपाल में मध्यावधि चुनाव की घोषणा

नेपाल में राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने मध्यावधि चुनाव के नवंबर में होने की घोषणा कर दी है। नेपाल में यह राजनीतिक अस्थिरता का दौर एक लंबे समय से चल रहा है।

Updated On: May 22, 2021 19:26 IST

Dastak

नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ (Photo Source- Google)

जावेद इक़बाल

नेपाल में आखिरकार एक लंबे राजनीतिक अस्थिरता के काल के बाद राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने मध्यावधि चुनाव के नवंबर में होने की घोषणा कर दी है। नेपाल में यह राजनीतिक अस्थिरता का दौर एक लंबे समय से चल रहा है। पहले नेपाल के प्रधानमंत्री ओपी शर्मा ओली ने समय से पूर्व संसद को भंग करके मध्यावधि चुनाव की मांग की थी, उनका मानना था कि उन्हें सहयोगी पार्टियों के द्वारा सहयोग ना किए जाने से विवश होकर यह निर्णय लेना पड़ रहा है।

दो तिहाई बहुमत वाली सरकार के मुख्य केपी शर्मा ओली ने अचानक संसद भंग करने की सिफारिश करके सबको चौंका दिया था, सत्ताधारी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के पीएम ओली के मतभेद लंबे समय से बने हुए थे। साल 2017 में नेपाल में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन-यूएमएल और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल प्रचंड कि सीपीएम के बीच गठबंधन हुआ था। दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा फिर दो तिहाई बहुमत हासिल किया और ओली को प्रधानमंत्री बनाया गया। कुछ ही दिनों बाद दोनों पार्टियों के प्रमुखों ने अपनी पार्टी का विलय कर एक नई पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की ओली और परचम दोनों इसके अध्यक्ष बने।

भारी बहुमत वाली इस पार्टी को विपक्ष से तो कोई चुनौती नहीं मिली, लेकिन पार्टी और सरकार के बीच कई मौकों पर गतिरोध जारी रहा प्रधानमंत्री ओली और पार्टी के अध्यक्ष प्रचंड के मतभेद कई बार घर के सामने आए, नेपाल के पार्टी के बड़े नेताओं ने कई मौके पर प्रधानमंत्री पर एकतरफा कार्य करने का आरोप लगाया, लेकिन ताजा विवाद की एक और वजह थी वह था एक विवादित अध्यादेश का प्रधानमंत्री ओली द्वारा पारित किया जाना, इस अध्यादेश के विरोध में विपक्ष के साथ-साथ पार्टी के नेताओं ने प्रधानमंत्री ओली पर निशाना साधा और इस अध्यादेश को वापस लेने का आह्वान किया बदले में प्रधानमंत्री ओली ने कैबिनेट ने संसद की प्रतिनिधि सभा को भंग करने की सिफारिश कर डाली।

सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष प्रचंड ने इस फैसले को अनंत लोकतांत्रिक और निरंकुशता का संकेत करार दिया, फिर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने कैबिनेट की सिफारिश पर मोहर लगाकर संसद भंग कर दी। इससे स्वयं राष्ट्रपति भी निशाने पर आ गई थी, आगे चलकर नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में संसद को बहाल कर दिया यही नहीं इस बीच सुप्रीम कोर्ट में प्रचंड और ओली की पार्टियों के विलय को इस आधार पर अवैध करार दिया कि एनसीपी के नाम से पहले से पार्टी पंजीकृत है, और इन निर्णयों ने पीएम केपी शर्मा ओली के संकट को और बढ़ा दिया आगे चलकर 10 मई 2021 को राष्ट्रपति ने बहुमत साबित करने के लिए प्रधानमंत्री ओली को बुलाया जिससे वे साबित नहीं कर सके।

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ऐसे समय जब सारी दुनिया के साथ ही नेपाल कोरोना महामारी से जूझ रहा है। यह राजनीतिक घटनाक्रम अप्रत्याशित भले ना हो अवांछित जरूर है। अब यह देखना होगा कि यह मध्यावधि चुनाव नेपाल में राजनीतिक स्थिरता लाने में कितना कामयाब होते हैं, क्योंकि यह स्थिरता न केवल नेपाल के लिए अपितु भारत के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

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