चीन का जासूसी जहाज श्रीलंका के बंदरगाह की तरफ क्यों जा रहा है और भारत इससे क्यों चिंतित है?

भारत एक चीनी जासूसी समुद्री जहाज पर पैनी नजर रख रहा है जो फिलहाल श्रीलंका के रास्ते में है और उसके 11 अगस्त के आसपास वहां के हंबनटोटा बंदरगाह पर आकर ठहरने की संभावना है।

Updated On: Aug 3, 2022 20:19 IST

Dastak

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भारत एक चीनी जासूसी समुद्री जहाज पर पैनी नजर रख रहा है जो फिलहाल श्रीलंका के रास्ते में है और उसके 11 अगस्त के आसपास वहां के हंबनटोटा बंदरगाह पर आकर ठहरने की संभावना है। इस जहाज की श्रीलंकाई बंदरगाह की यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब ये देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। भारत इस जहाज की यात्रा के खिलाफ पहले ही अपना विरोध दर्ज करा चुका है।

चीन का ये कौन सा जहाज है जो श्रीलंका जा रहा है?

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक चीनी अनुसंधान और और सर्वेक्षण पोत जिसका नाम 'युआन वांग 5' है वो श्रीलंकाई बंदरगाह हंबनटोटा के रास्ते में है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण गहरा समुद्री बंदरगाह है, इस बंदरगाह को लंका ने बीजिंग से ऋण लेकर विकसित किया गया है।

चीन अपने 'युआन वांग' श्रेणी के जहाजों का इस्तेमाल सैटेलाइट, रॉकेट और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) के प्रक्षेपण को ट्रैक करने के लिए करता है। चीन के पास इन जहाजों की श्रेणी में सात ऐसे ट्रैकिंग जहाज हैं जो पूरे प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागरों में काम करने में सक्षम हैं। ये जहाज बीजिंग के भूमि-आधारित ट्रैकिंग स्टेशनों के पूरक हैं।

अमेरिकी रक्षा विभाग की रिपोर्ट की मानें तो ये अंतरिक्ष सपोर्ट वाले जहाज पीएलए (चीनी सेना) के सामरिक समर्थन बल (एसएसएफ) द्वारा संचालित किया जाता है, जो "पीएलए के रणनीतिक स्थान, साइबर, इलेक्ट्रॉनिक, सूचना, संचार और मनोवैज्ञानिक युद्ध मिशन और क्षमताएं को केंद्रीकृत करने के लिए स्थापित एक थिएटर कमांड-स्तरीय संगठन है।

'युआन वांग 5' चीन के जियांगन शिपयार्ड में बनाया गया था और इसने सितंबर 2007 में सेवा में प्रवेश किया था। 222 मीटर लंबे और 25.2 मीटर चौड़े इस जहाज में ट्रांसओसेनिक एयरोस्पेस अवलोकन के लिए अत्याधुनिक ट्रैकिंग तकनीक है।

इसका अंतिम निगरानी मिशन चीन के 'लॉन्ग मार्च 5बी' रॉकेट का प्रक्षेपण था। यह हाल ही में चीन के तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन के पहले लैब मॉड्यूल के प्रक्षेपण की समुद्री निगरानी में भी शामिल था।

यह जहाज श्रीलंका की ओर क्यों जा रहा है?

बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव श्रीलंका (बीआरआईएसएल) के अनुसार, चीनी जहाज 'युआन वांग 5' एक सप्ताह के लिए 11 अगस्त को हंबनटोटा बंदरगाह में प्रवेश करेगा और संभवत: फ्यूल की पुनः पूर्ति के बाद 17 अगस्त को वहां से रवाना हो जाएगा।

बीआरआईएसएल ने अपनी वेबसाइट पर कहा, "युआन वांग 5 अगस्त और सितंबर के बीच हिंद महासागर क्षेत्र के उत्तर पश्चिमी हिस्से में सेटेलाइट कंट्रोल और अनुसंधान ट्रैकिंग करेगा। श्रीलंकाई वेबसाइट के अनुसार "'युआन वांग 5' की हंबनटोटा बंदरगाह की यात्रा श्रीलंका और पास के विकासशील देशों के लिए अपने स्वयं के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को सीखने और विकसित करने का एक उत्कृष्ट अवसर है।

भारत इस जहाज के श्रीलंका में प्रवेश को लेकर चिंतित क्यों है?

'युआन वांग 5' एक शक्तिशाली ट्रैकिंग पोत है जिसकी महत्वपूर्ण हवाई पहुंच 750 किलोमीटर के करीब है। अब इस ट्रैकिंग क्षमता के अनुसार भारत के केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई बंदरगाह चीन के रडार पर हो सकते हैं। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इससे दक्षिण भारत में कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की जासूसी किए जाने का खतरा हो सकता है।

पिछले हफ्ते इस जहाज के मुद्दे पर बात करते हुए भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था: "हम अगस्त में इस जहाज द्वारा हंबनटोटा की प्रस्तावित यात्रा की रिपोर्ट से अवगत हैं ... सरकार भारत की सुरक्षा और आर्थिक हितों पर असर डालने वाले किसी भी विकास की सावधानीपूर्वक निगरानी करती है और उनकी सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करता है।"

जवाब में, चीन के विदेश मंत्रालय ने रॉयटर्स द्वारा रिपोर्ट किए गए एक बयान में कहा: "चीन को उम्मीद है कि संबंधित पक्ष चीन की समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान गतिविधियों को सही ढंग से देखें और रिपोर्ट करेंगे और सामान्य और वैध समुद्री गतिविधियों में हस्तक्षेप करने से परहेज करेंगे।"

श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह राजनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

हंबनटोटा श्रीलंका का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह है, ये दक्षिण पूर्व एशिया को अफ्रीका और पश्चिम एशिया से जोड़ने वाले मार्ग पर स्थित है। चीन के लिए यह उसकी बेल्ट एंड रोड पहल में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसके विकास को बड़े पैमाने पर चीन द्वारा वित्त पोषित किया गया है, और 2017 में, कोलंबो ने बढ़ते कर्ज को चुकाने में विफल रहने के बाद इसकी एक बड़ी हिस्सेदारी एक चीनी फर्म को सौंप दी थी।

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भारत और अमेरिका ने बार-बार इस बात पर चिंता जताई है कि इस बंदरगाह पर चीनी नियंत्रण पीएलए नौसेना का केंद्र बनकर हिंद महासागर में उनके हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। भारत में सुरक्षा विशेषज्ञों ने अक्सर इसकी आर्थिक व्यवहार्यता पर सवाल उठाया है, चीन यहां अपना ठिकाना बनाकर भारत को समुद्र के रास्ते घेर सकता है।

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