महिलाएं प्लाज्मा डोनेशन क्यों नहीं कर सकती? जानें इसके पीछे क्या है खास वजह

एंटीबॉडी प्‍लाज्‍मा थेरेपी (Antibody Plasma Therapy) की प्रक्रिया में प्लाज्मा निकालने के लिए भी खून निकाला जाता है। लेकिन ब्लड डोनेशन (Blood Donation) और प्लाज्मा डोनेशन (Plasma Donation) की प्रक्रिया में काफी अंतर है।

Updated On: May 10, 2021 11:16 IST

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डॉली मेहरोत्रा

एंटीबॉडी प्‍लाज्‍मा थेरेपी (Antibody Plasma Therapy) की प्रक्रिया में प्लाज्मा निकालने के लिए भी खून निकाला जाता है। लेकिन ब्लड डोनेशन (Blood Donation) और प्लाज्मा डोनेशन (Plasma Donation) की प्रक्रिया में काफी अंतर है। प्लाज्मा थेरेपी के लिए जब व्यक्ति के शरीर से खून निकाला जाता है, तो ब्लड से प्लाज्मा निकालकर खून को वापस शरीर में डाल दिया जाता है। वहीं, गर्भवती महिलाएं अपने शरीर का प्लाज्मा नहीं डोनेट कर सकती हैं, क्योंकि इससे कोविड-19 के मरीजों के फेफड़ों को और अधिक नुकसान पहुंच सकता है। इससे मरीज को ट्रांस्फ्यूजन रिलेटेड एक्यूट लंग इंजरी (टीआरएएलआई) हो सकती है।

महिलाओं में गर्भधारण के बाद भ्रूण में पिता के अंश के खिलाफ एंटीबॉडी बनती हैं, क्योंकि यह एक बाहरी तत्व है। इन एंटीबॉडी को ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) कहा जाता है। बता दें कि महिला के जितने ज्यादा बच्चे होंगे उसके शरीर में उतना ही अधिक एंटीबॉडी होगा। ये ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन महिला की रोग प्रतिरोधक क्षमता का हिस्सा है, जो यह पहचानने में उनकी मदद करता है कि यह शरीर में आया तत्व बाहर का है या शरीर का।

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मां बनने वाली महिलाओं में यह एक सामान्य बात है, इससे मां और बच्चे को कोई नुकसान नहीं होता है, लेकिन दूसरे व्यक्ति के लिए यह नुकसानदायी हो सकता है। क्योंकि जब यह एचएलए एंटीबॉडी प्लाज्मा के जरिए किसी अन्य व्यक्ति के शरीर में पहुंचती है तो वह फेफड़ों की लाइनिंग में मौजूद व्हाइट ब्लड सेल्स के साथ प्रतिक्रिया करती है। इससे फेफड़ों को नुकसान पहुंच सकता है। सामान्य भाषा में कहें तो इससे फेफड़ों में एक तरल पदार्थ भर जाता है। इस तरल पदार्थ के कारण मरीज को सांस लेने में परेशानी हो सकती है। इसलिए गर्भवती महिलाएं या फिर मां बनी महिलाओं को प्लाज्मा डोनेट करने के लिए मना किया गया है।

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(ये लेख लेखक डॉली मेहरोत्रा की फेसबुक वॉल से लिया गया है, इसमें दिए गए तथ्य और विचार उन्हीं के हैं)

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