अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संसद में हिंदी के अलावा अंग्रेजी न बोलने का लिया संकल्प, जानें फिर क्या हुआ?

साल 1957 में संसद में अटल बिहारी वाजपेयी का पहला भाषण था। धोती, कुर्ता और सदरी पहने वाजपेयी जब भाषण देने के लिए उठे तो विरोध शुरू हो गया। वो दौर हिन्दी विरोधी आन्दोलनों का था। लोग उन्हें हिन्दी में नहीं सुनना चाहते थे। उनका भाषण हिन्दी में शुरू होने पर कई सांसद विरोध में बाहर चले गये।

Updated On: Dec 25, 2020 13:25 IST

Dastak

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जिन्दगी में हर दिन नये गीत लिखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी का हिन्दी प्रेम सिर्फ दिखावे का नहीं था और न ही वो बाकि नेताओं की तरह इसकी औपचारिकता पूरी करते दिखे। उन्होंने हमेशा हिंदी को बढ़ावा देने का काम किया। हिन्दी में बोलने में न तो कभी जरा सी शर्म महसूस की और न ही किसी तरह की हिचकिचाहट रही। बल्कि बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जिनकी हिन्दी से पहली मुलाकात ही उनके भाषणों को सुन कर हुई होगी। अटल बिहारी बाजपेयी की कविताएँ, लेख और भाषण उनके हिन्दी प्रेम के गवाह हो सकते हैं, लेकिन हिन्दी को मान्यता दिलाने की लड़ाई भी हमेशा लड़ते रहे।

संसद के शुरुआती दिनों में था अंग्रेजी का बोलबाला-

पत्रकार विजय त्रिवेदी द्वारा लिखी गई अटल जी की जीवन गाथा "हार नहीं मानूंगा" के अनुसार संसद के शुरुआती दिनों में सदन के भीतर अंग्रेजी का बोलबाला था। ज्यादातर बहस सिर्फ अंग्रेजी में हुआ करती थी और खासतौर से विदेशी मामलों पर, जो कि वाजपेयी का प्रिय विषय था। वाजपेयी ने देश में ही नहीं विदेश में भी हिन्दी का परचम फहराया। 1977 में वाजपेयी जब मोरारजी देसाई सरकार में विदेश मंत्री बने तो पहली बार किसी भारतीय नेता ने संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण दिया और वे अन्य अवसरों पर भी विदेशों में अक्सर हिन्दी में भाषण देते रहे। विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्त राष्ट्र सभा के बत्तीसवें अधिवेशन में हिन्दी में भाषण देने वाले वह पहले मंत्री थे। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनका पहला भाषण 4 अक्टूबर 1977 को हुआ।

अटल के हिंदी भाषण से संसद से उठकर चले गए सासंद-

हास्य और व्यंग्य भी उनकी भाषा में उतना ही घुला-मिला था। साल 1957 में संसद में उनका पहला भाषण था। धोती, कुर्ता और सदरी पहने वाजपेयी जब भाषण देने के लिए उठे तो विरोध शुरू हो गया। वो दौर हिन्दी विरोधी आन्दोलनों का था। लोग उन्हें हिन्दी में नहीं सुनना चाहते थे। उनका भाषण हिन्दी में शुरू होने पर कई सांसद विरोध में बाहर चले गये। लेकिन वे भाषण देते रहे। उन्होंने हिन्दी के अलावा अंग्रेजी में न बोलने का संकल्प भी लिया था। फिर वैसे दिन भी आये जब उनका भाषण संसद में हो या आमसभा में, सुनने के लिए लोग इन्तजार करते रहते थे।

अटल बिहारी हिंदी में बोलकर सबका ध्यान खींच लेते थे-

1957 में दूसरी लोकसभा में जनसंघ के चारों सदस्य पहली बार चुन कर संसद पहुँचे थे। इनमें से कोई पहले विधायक भी नहीं रहा था विधायी कार्य का कोई अनुभव नहीं था। पिछली बेंचों पर बैठने की वजह से बोलने का मौका ही नहीं मिलता था। वाजपेयी की शुरू से ही विदेश नीति पर अच्छी पकड़ थी। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ही विदेश मंत्री थे। उस वक्त संसद में अंतराष्ट्रीय विषयों पर अच्छी बहस होती थी, लेकिन जनसंघ को दो चार मिनट से ज़्यादा का मौका ही नहीं मिल पाता था। विदेश नीति पर ज़्यादातर भाषण अंग्रेजी में होते थे, लेकिन वाजपेयी हिन्दी में धाराप्रवाह बोल कर पूरे सदन का ध्यान अपनी ओर खींच लेते थे।

जब प्रधानमंत्री नेहरु ने किया अटल की बात का सम्मान-

20 अगस्त 1958 को प्रधानमंत्री नेहरू ने एक बहस का पुरा जवाब अंग्रेजी में दिया और इसके बाद अध्यक्ष से हिन्दी में कुछ कहने की इजाज़त माँगी। फिर नेहरू ने वाजपेयी का नाम लेकर भाषण शुरू किया, "कल जो बहुत से भाषण हुए, उनमें से एक भाषण श्री वाजपेयी जी का भी हुआ। अपने भाषण में उन्होंने एक बात कही थी और मेरे ख़याल में जो हमारी वैदेशिक नीति है, वह उनकी राय में सही है। एक बात उन्होंने और भी कही कि बोलने के लिए वाणी चाहिए। लेकिन चुप रहने के लिए वाणी और विवेक दोनों चाहिए। इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ।" आगे पण्डित नेहरू ने वाजपेयी के भाषण पर विस्तार से जवाब दिया।

जब वाजपेयी ने की यूपीएससी की परीक्षा में हिंदी को अनिवार्य करने की वकालत-

22 फ़रवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर बहस हो रही थी। उन दिनों वाजपेयी राज्यसभा के सदस्य थे। वाजपेयी ने हिन्दी को लेकर बड़ी लम्बी तकरीर की। वाजपेयी ने अपना भाषण बड़े आक्रामक अन्दाज़ में शुरू करते हुए कहा, "सभापति जी, मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रान्त में पैदा हुआ होता, क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज़्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज़ पहले अहिन्दी प्रान्तों से उठी। स्वामी दयानन्द जी, महात्मा गाँधी या बंगाल के नेता हिन्दी भाषी नहीं थे।" वाजपेयी ने अपने इस भाषण में एक अहम सुझाव देते हुए नौकरी और भाषा का रिश्ता समझाया।

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वाजपेयी बोले, "कहा जाता है कि झगड़ा नौकरियों का है। बच्चों का भविष्य क्या बनेगा? यूपीएससी के लिए अंग्रेज़ी चल रही है। अंग्रेज़ी के साथ हिन्दी और एक अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया जाये अभी हिन्दी राज्यों में तीन भाषायी फार्मूला नहीं चल रहा, चलना चाहिए। लेकिन जब तक नौकरी के लिए उसकी ज़रूरत नहीं होगी, कोई दक्षिण की भाषा नहीं पड़ेगा। यूपीएससी के इम्तिहान में विद्यार्थी को अपनी मातृभाषा के अलावा एक और भारतीय भाषा को अनिवार्य रूप से जानना चाहिए।"

मद्रास के हिंदी विरोधी आंदोलन का वाजपेयी ने ऐसे दिया जवाब-

उस वक्त मद्रास में और कुछ दूसरे इलाकों में हिन्दी के विरोध में आन्दोलन चल रहा था। उसी पर वाजपेयी ने कहा कि, "मैं धमकी देना नहीं चाहता। अगर आन्दोलन मद्रास में हो सकता है तो भावनाएँ और जगहों पर भी उभारी जा सकती हैं। हमारी देशभक्ति को भाषा की कसौटी पर मत कसिये। हम राष्ट्र की एकता चाहते हैं। जो लोग अंग्रेज़ी से राष्ट्र की एकता की रक्षा करना चाहते हैं वे राष्ट्र की एकता का मतलब नहीं समझते। राष्ट्र की सच्ची एकता तब पैदा होगी जब भारतीय भाषाएँ अपना स्थान ग्रहण कर लेंगी। एक बार वहाँ के आम आदमी समझ जायें कि दो फ़ीसदी अंग्रेज़ी जानने वाले लोग हमें गुलाम रखने के लिए हिन्दी के विरोध का नारा लगा रहे हैं तो फिर अंग्रेज़ी नहीं रहेगी।"

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