सोन चिरैया को विलुप्ति से बचाने की मुहिम तेज, बची है सिर्फ इतनी

हमारी किस्से-कहानियों और गीतों में शामिल (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) यानी सोन चिरैया पिछले कुछ दशकों में विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई है।

Updated On: Dec 23, 2020 14:58 IST

Dastak Web 1

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हमारी किस्से-कहानियों और गीतों में शामिल (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) यानी सोन चिरैया पिछले कुछ दशकों में विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई है। राजस्थान में बचे इनके आखिरी कुनबे को संभालने के लिए वाइल्डलाइफ़ कंजर्वेशन सोसाइटी इंडिया (WCSI) के वैज्ञानिक भी काम कर रहे हैं। वैज्ञानिकों की मदद से ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को खुले नंगे तारों से बचाने की मुहिम चलाई जा रही है। इस मुहिम के तहत राजस्थान के पोखरण में 6.5 किमी के खिंचाव के साथ उच्च-तनाव तारों पर करीब 1,848 पक्षी डायवर्टर स्थापित किए गए है।

ये हवा के साथ घूमते है तथा फ्लैश करते है

बिजली के तार सोन चिरैया के जीवन का सबसे बड़ा संकट हैं। (WCSI) के एसोसिएट अनिल कुमार बताते है कि ये डायवर्टर 6 इंच लंबा और 4 इंच चौड़ा एक फ्लैप है। जो तारों पर चढ़ा हुआ है। जब आप दूर से डायवर्टर को देखते हैं। तो वे तारों पर बैठे फायरफ्लाइज की एक स्ट्रिंग की तरह दिखाई देते हैं। ये हवा के साथ घूमते है तथा फ्लैश करते है। वे लगभग 50 मीटर दूर से दिखाई दे जाते है। उनसे रोशनी निकलती है। जिससे बिजली के तार दूर से दिखायी दे जाते हैं। और दुर्घटना की आशंका टल जाती है। रात के अंधेरे में बिजली के तारों को देखना मुमकिन नहीं होता है। इसलिए सोन चिरैया की मौत की सबसे बड़ी वजह बिजली के तार ही हैं।

ये पक्षियों को संकेत दे देता है

बर्ड डायवर्टर एक तरह से रात को सड़कों के डिवाइडर पर लगी फ्लैश लाइट की तरह ही काम करते हैं। ये पक्षियों को संकेत दे देता है कि आसमान में यहां पर बाधा है। डॉ झाला बताते हैं कि विदेशों में पक्षियों को बचाने के लिए इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल होता आया है। लेकिन भारत में ये पहली बार लगाए जा रहे हैं।

ये देश के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षी हैं

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बड़े पक्षी होते हैं। जिनके सिर पर अद्वितीय काली टोपी होती हैं। और ये भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाते हैं। ये देश के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षी हैं। और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित हैं। वन्यजीव विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, सोन चिरैया की संख्या भारत में मात्र 150 है। और ये राजस्थान में ही सिमटकर रह गई हैं। सोन चिरैया की संख्या कम होने की एक वजह ये भी है कि ये पक्षी एक साल में सिर्फ एक ही अंडा देती है। जिसमें 50 फीसदी अंडे समय से पहले ही नष्ट हो जाते हैं। डॉ झाला बताते हैं कि रेगिस्तान में पानी आने के साथ ही कुत्ते और सूअर जैसे जानवर भी आ गए हैं। ये जानवर उनके अंडे और चूजे खा जाते हैं।

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ग्रेट इंडियन बस्टर्ड्स की जनसंख्या घटने को लेकर (WCSI) ने ग्रामीण भारत समर्थन ट्रस्ट (RIST), पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राजस्थान वन विभाग के साथ साझेदारी की है। ताकी इनकी घटती जनसंख्या को नियंत्रित किया जा सके। अस्सी के दशक तक देश के 11 राज्यों में करीब 1500-2000 तक सोन चिरैया मौजूद थीं। बिजली के तारों का विस्तार, अवैध शिकार और घास के मैदानों का कम होना इन चिड़ियों को खतरे की जद में ले आया। अगर सोन चिरैया को बचाना है। तो इसके लिए प्रयास तेज़ करना होंगे। अगर ऐसा नहीं किया गया तो चीता के बाद देश से विलुप्त होने वाली ये दूसरी बड़ी जीव प्रजाती होगी।

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