समलैंगिक विवाह पर जवाब न मिलने से भड़का दिल्ली HC, सरकारों से मांगा जवाब

दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र और दिल्ली सरकार को हिंदू मैरिज एक्ट, स्पेशल मैरिज एक्ट और फॉरेन मैरिज एक्ट के तहत समलैंगिक विवाह की मान्यता और पंजीकरण की मांग वाली याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने का एक आखिरी मौका दिया है।

Updated On: Jan 9, 2021 14:09 IST

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दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र और दिल्ली सरकार को हिंदू मैरिज एक्ट, स्पेशल मैरिज एक्ट और फॉरेन मैरिज एक्ट के तहत समलैंगिक विवाह की मान्यता और पंजीकरण की मांग वाली याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने का एक आखिरी मौका दिया है। दायर याचिका में यह तर्क रखा गया है कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है तो ऐसे में समलैंगिक जोड़े के विवाह को मान्यता क्यों नहीं प्रदान की जा रही है।

न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडलॉ न्यायमूर्ति संजीव नरूला की खंडपीठ समलैंगिक विवाह को मंजूरी देने की मांग को लेकर दायर अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। बता दें कि खंडपीठ ने 19 नवंबर, 2020 को केंद्र व दिल्ली सरकार से 4 सप्ताह के भीतर जवाब मांगा था।

मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को तय की है

अदालत ने बताया कि अक्टूबर और नवंबर में नोटिस जारी करने के बावजूद अधिकारियों द्वारा मामले में कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया है। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को मामले में जवाबी हलफनामा दायर करने के लिए और समय मांगा है। मामले में जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय देते हुए अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को तय की है।

समलैंगिक जोड़ों के बीच विवाह संभव नहीं हो पा रहा है

याचिका में कहा गया है कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रख दिया है। तो उसके बावजूद भी समलैंगिक जोड़ों के बीच विवाह संभव नहीं हो पा रहा है। दो महिलाओं ने आपस में उनके विवाह को मंजूरी देने की मांग की है। उन्होंने तर्क रखा है कि वे पिछले आठ साल से साथ रह रहीं है। और एक दूसरे से प्यार करती हैं। उन्होंने कहा कि वे साथ मिलकर जीवन में उतार-चढ़ाव का सामना कर रही हैं। उन्होंने कालकाजी के एसडीएम को कानून के तहत उनका विवाह पंजीकृत करने का आदेश देने की भी मांग की है।

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आपको बता दें कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत समान लिंग विवाह को मान्यता देने की जनहित याचिका अभिजीत अय्यर-मित्रा और तीन अन्य लोगों ने दायर की है। अदालत ने पिछले साल यह माना था कि यह क़ानून लैंगिक तटस्थ है। और केंद्र को भारत के नागरिकों के पक्ष में कानून की व्याख्या करनी चाहिए।

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