जब मुगल सम्राजय का पतन हो रहा था तब गालिब ने ये शेर लिखा

गालिब मुगल सम्राजय के अंत समय में लिखते हैं- इन अशुभ संकेतों के बावजूद अभी तक कयामत का दिन क्यों नहीं आया? अंतिम घड़ी की विजय ध्वनि क्यों नहीं सुनाई देती? अंतिम विनाश का सूत्र किसके हाथों में है... ?"

Updated On: Aug 24, 2022 10:03 IST

Dastak

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बात सन् 1827 की है, तब वसंत में मशहूर शायर मिर्जा असदुल्ला खान गालिब, दिल्ली से कलकत्ता की यात्रा पर रवाना हुए। छह महीने के बाद वह हिंदुओं के पवित्र शहर बनारस पहुंचे। यहां उन्होंने चिराग-ए-दैर के नाम से शायरी लिखी जिसकी कालजयी पंक्तियां कुछ इस तरह की हैं -

मैंने एक रात एक पहुंचे हुए संत से पूछा

(जो इस कालचक्र का रहस्य जानता था) बाबा, तुम जानते हो कि अच्छाई और विश्वास,

नैतिकता और प्रेम इस अभागे देश से पलायन कर चुका है, बाप और बेटे एक दूसरे का गला काटने पर उतारू हैं, भाई और भाई लड़ रहे हैं,

एकता और संघ की भावना खत्म गई है,

इन अशुभ संकेतों के बावजूद अभी तक कयामत का दिन क्यों नहीं आया? अंतिम घड़ी की विजय ध्वनि क्यों नहीं सुनाई देती? अंतिम विनाश का सूत्र किसके हाथों में है... ?"

मुगल साम्राज्य के पतन की पृष्ठभूमि में लिखा गया था शेर-

गालिब का शेर मुगल साम्राज्य के पतन की पृष्ठभूमि में लिखा गया था। गंगा-सिंधु की घाटी का उनका अपना इलाका जो कभी एक बादशाह के अधीन था, अब आपस में लड़ते-कटते कई सरदारों और सेनाओं में बंट चुका था। भाई से भाई लड़ रहे थे, एकता और संघ की भावना कहीं नहीं थी।

अंग्रेजों की शक्ल में नई ताकत हिंदुस्तान में फैला रही थी पैर-

लेकिन जब वह इन पंक्तियों को रहे थे उसी वक्त अंग्रेजों की शक्ल में एक नई (और विदेशी) ताकत हिंदुस्तान की सरजमीन पर अपना पंजा फैला रही थी। वे धीरे-धीरे उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित करते जा रहे थे। उसके बाद सन् 1857 में देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ जिसे साम्राज्यवादियों ने सिपाही विद्रोह कहा तो राष्ट्रवादियों ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया।

सबसे अधिक लड़ाईयां गालिब के अपने शहर दिल्ली में हुई-

उस दौर की कुछ सबसे ज्यादा रक्तरंजित लड़ाइयां गालिब के अपने शहर दिल्ली में ही हुई थीं जो अभी भी नाममात्र के लिए मुगलों की राजधानी थी और जानेवाले वक्त में अंग्रेजों की राजधानी होनेवाली थी। गालिब की अपनी सहानुभूति भी खंडित अवस्था में थी। वे नए शासकों से वजीफा पा रहे थे, हलांकि वे मुगल संस्कृति और उसकी शानो-शौकत के वारिस थे जैसा उस वक्त ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने या बाद में भारतीय राष्ट्रवादियों ने महसूस किया उस तुलना में गालिब ने ज्यादा साफतौर पर देखा कि सही को गलत से अलग करने का फर्क मिट चुका था और दोनों ही पक्षों द्वारा भयानक अत्याचार किया जा रहा था। अपने ही मुल्क में अलग-थलग हो चुके गालिब ने बड़े दुख के साथ इन पंक्तियों को लिखा- हिंदुस्तान, प्रबल झंझावातों और आग की लपटों से घिरा हुआ है। यहां के लोग किस नई व्यवस्था की तरफ उम्मीद और खुशियों से देखें?

जब ब्रिटिश सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से सत्ता छीनी-

लेकिन इस सवाल का एक जवाब सामने आ रहा था। सन् 1857 की घटनाओं के बाद ब्रिटिश सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से सत्ता छीन ली। पुरानी ईस्ट इंडिया कंपनी की अस्थायी और लुंजपुंज नौकरशाही की जगह एक परिष्कृत नौकरशाही ने ले ली। नए जिले और सूबों का गठन किया गया। अब राज्य का प्रशासन संभ्रांत मानेजाने वाले इंडियन सिविल सर्विस के अफसरों द्वारा चलाया जाने लगा जिन्हें कामकाज में पुलिस, जंगल, सिंचाई आदि विभाग सहायता दे रहे थे। पूरे देश में रेलवे का जाल बिछाने के लिए काफी ऊर्जा (और संसाधन) खर्च किया गया। इसने ब्रिटिश भारत को काफी हद तक एकता और स्थायित्व प्रदान किया क्योंकि अब शासक वर्ग तेजी से देश के किसी भी इलाके में जरूरत पड़ने पर सेना भेज सकता था और 1857 के दोहराव को रोक सकता था।

(किताब भारत गांधी के बाद का एक अंश)

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