Juvenile Justice Board ने बलात्कार के आरोप में 7 साल के बच्चे को किया बरी

पिछले साल अक्टूबर में एक नाबालिग लड़के पर बलात्कार के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। अलीगढ़ के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने नाबालिग लड़के को छुट्टी देने का आदेश देते हुए कहा था कि उसकी उम्र सात साल से कम थी।

Updated On: Jan 10, 2021 13:35 IST

Dastak Web 1

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पिछले साल अक्टूबर में एक नाबालिग लड़के पर बलात्कार के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। अलीगढ़ के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने नाबालिग लड़के को छुट्टी देने का आदेश देते हुए कहा था कि उसकी उम्र सात साल से कम थी।उस लड़के पर उसके पड़ोस की छह साल की लड़की के साथ कथित तौर पर बलात्कार करने का मामला दर्ज किया गया था। लड़के के वकील ने कहा कि मामला दर्ज होने के बाद हमने जेजे बोर्ड को स्थानांतरित किया और लड़के की अंतरिम जमानत प्राप्त की। इसके बाद हमने बोर्ड के समक्ष एक आवेदन दिया। जिसमें सात साल से कम उम्र के इस नाबालिग लड़के को बरी करने की मांग की गई थी। आवेदन में आईपीसी की धारा 82 और 83 के माध्यम से कहा गया है कि उस लड़के की समझ अपरिपक्व थी। चूंकि लड़के के पास अपनी उम्र को साबित करने के लिए कोई शैक्षिक प्रमाण पत्र नहीं है और वह अनपढ़ है।

लड़के की उम्र छह साल और 11 महीने थी

इसलिए हमने बोर्ड से कहा कि अलीगढ़ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को निर्देश दिया जाए कि वह लड़के की उम्र निर्धारित करें और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें।लड़के के पिता एक मजदूर के रूप में काम करते हैं। जबकि भारतीय दंड संहिता की धारा 82 में कहा गया है कि सात वर्ष से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया गया अपराध कोई अपराध नही माना जाएगा। धारा 83 में सात औऱ 12 वर्ष की आयु के बच्चों की समझ अपरिपक्व मानी जाती है। सीएमओ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि लड़के की उम्र छह साल और 11 महीने थी। उम्र को ध्यान में रखते हुए बोर्ड ने मामले का निपटारा किया। वकील ने बताया कि पुलिस ने मामले में आरोप पत्र दायर नहीं किया था।

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स्थानीय एसएचओ के अनुसार लड़के के खिलाफ लड़की के पिता ने 12 अक्टूबर को एफआईआर दर्ज कराई थी। लड़की के पिता ने आरोप लगाया था कि उनकी बेटी घर के बाहर खेल रही थी। और जब वह अपनी गेंद लेने के लिए पड़ोसी के घर में दाखिल हुई तो लड़के ने उसे पकड़ लिया और उसका यौन उत्पीड़न किया। पिता की शिकायत पर लड़के पर बलात्कार और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।

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