सुप्रीम कोर्ट ने कहा सेना के जवान की विकलांगता के पीछे अगर सैन्य कारण नहीं तो वो विकलांगता पेंशन का हकदार नहीं माना जाएगा

सुप्रीम कोर्ट अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज की दलील से सहमत नजर आई, अदालत ने माना कि सशस्त्र बलों के जवानों को सैन्य सेवा के दौरान लगी चोटों और उनकी विकलांगता के बीच उचित संबध होना चाहिए।

Updated On: Jul 19, 2022 14:01 IST

Dastak

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Source- Pixabay)

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले पर टिपण्णी करते हुए कहा है कि सेना के जवान विकलांगता पेंशन के हकदार तभी माने जाएंगे जब उनकी उस विकलांगता के पीछे सैन्य कारण हो। कोर्ट के अनुसार विकलांगता अगर सैना में नौकरी के दौरान हुए हादसे या फिर सेवा के दौरान विकलांगता बढ़कर 20 प्रतिशत अधिक हो गई हो तो ही वो पेंशन के हकदार हो पाएंगे।

न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की अदालत केंद्र सरकार की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी जो सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के उस फैसले को चुनौती देती है जिसके तहत जवानों को विकलांगता पेंशन दी जाती है। अदालत अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज की दलील से सहमत नजर आई, अदालत ने माना कि सशस्त्र बलों के जवानों को सैन्य सेवा के दौरान लगी चोटों और उनकी विकलांगता के बीच उचित संबध होना चाहिए।

अदालत ने सेना के एक जवान जो मिलिट्री स्टेशन छोड़ने के दो दिन बाद हादसे का शिकार होता है उसके दावे को खारिज करते हुए कहा कि जबतक विकलांगता सैन्य कारण या सैन्य कारणों से 20 प्रतिशत न बढ़ जाए तब तक आप विकलांगता पेंशन के हकदार नहीं होंगे। किसी अन्य स्थान पर विकलांगता आना जिसका सेना से कोई संबध नहीं है उसे सेना का विकलांगता पेंशन का हकदार नहीं माना जाएगा।

ताजा मामले में कार्ट ने कहा कि एक जवान सेना का स्टेशन छोड़ने के दो दिन बाद एक सार्वजनिक सड़क पर दुर्घटना का शिकार हो गया था। यहां इस दुर्घटना का सेना से कोई सीधा संबध नहीं है, न ही सेना में नौकरी के दौरान आई किसी घटना से भी कोई संबध है। ऐसे में सेना की ट्रिब्यूनल ने इस पहलू को पुरी तरह अनदेखा किया है जो इस मामले की जड़ है।

इस मामले में सैन्य कर्मी 4 जून 1965 को सेना में भर्ती हुआ था और 10 साल 88 दिन की एक्टिव सेवा के बाद वो 30 अगस्त 1975 को आरक्षित फोर्स में ट्रांसफर हो गए थे। आरक्षित फोर्स की की इस अवधि के दौरान जवान ने स्वेच्छा से 7 जनवरी 1976 को रक्षा सुरक्षा कोर ज्वाईन किया। इस दौरान 6 नवंबर 1999 को उन्हें सालाना अवकाश दिया गया।

अपने इस सालाना अवकाश के दौरान ये जवान सड़क पार करते समय एक स्कूटर से टकरा कर हादसे का शिकार हो गया। सेना के मेडिकल बोर्ड ने जवान की विकलांगता का आंकलन 80 प्रतिशत किया और उसे निम्न चिकित्सा श्रेणी में रखा। इस आधार पर उन्हें 28 सितंबर 2000 को सेना से सेवानिर्वित कर दिया गया, जिसपर जवान ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण को एक आवेदन दिया जिसमें उन्हें विकलांगता पेंशन देने की प्रार्थना की गई थी।

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इसपर ट्रिब्यूनल ने कहा था कि यदि किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की छुट्टी जो सेना द्वारा अधिकृत रुप से दी गई है और जवान उस दौरान किसी दुर्घटना के कारण चोटिल हो जाता है तो उसका कार्य सैन्य सेवा से जुड़ा नहीं था ट्रिब्यूनल ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की अधिकृत छुट्टी की अवधि के दौरान चोट लगती है तो उसकी विकलांगता सैन्य सेवा के कारण मानी जाएगी।

ट्रिब्यूनल के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने अब पलटा है और जवान की चोट के पीछे सैन्य कारण न होने के कारण उसे विकलांगता पेंशन का हकदार नहीं माना है।

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