महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है? जानें इसके पीछे का रहस्य

साधकों के लिए महाशिवरात्रि वह दिन है जब शिव कैलाश पवर्त में समा गए थे। इस दिन वे एक पर्वत की तरह स्थिर और निश्चल हो गए थे। योगी साधक शिव को कभी देवता की तरह नहीं पूजते। वे उन्हें आदि गुरु मानते हैं। आदिगुरु का अर्थ वो पहला गुरु है जिसने ज्ञान की उत्पत्ति की।

Updated On: Feb 28, 2022 20:18 IST

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महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है यह सवाल बहुत से भक्तगणों के मन में होता है, शास्त्रों के अनुसार इस रात्री को ही भगवान शिव प्रकट हुए थे। वे करोड़ों सूर्य के समामन प्रभावी ज्योतिर्लिंग के स्वरुप में भगवान शिव ने अपने दर्शन दिए थे। जिस कारण हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। इसे शिव और शक्ति के मिलन की रात भी कहा जाता है। एक कथा के अनुसार इस दिन 64 जगहों पर एकसाथ शिवलिंग प्रकट हुए थे लेकिन हमें इनमें से केवल 12 जगहों के बारे में ही पता है।  जिन्हें हम 12 ज्योतिर्लिंग भी कहते हैं।

महाशिवरात्रि का त्यौहार भारत में पूरे विधि-विधानों से मनाया जाता है। इसे शिव के दिव्य रुप में पृथ्वी पर आने का दिन भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से व्यक्ति के काम, क्रोध,मत्सर, लोभ, मोह आदि से मुक्ति मिलती है। उज्जेन के महाकालेश्वर मंदिर में तो इस दिन दीपस्तंभ लगाया जाता है। ताकि वहां आने वाले भक्तगण शिवजी के ज्योतिर्लिंग स्वरुप का अनुभव कर सकें। शिवभक्त इसी दिन शिव जी के विवाह के उत्सव को भी मनाते हैं। माना जाता है कि इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन त्यागकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था।

महाशिवरात्रि के दिन ये कथा प्रचलित है-

पौराणिक ग्रंथों की मानें तो माता पार्वती के रुप में सती का पुनर्जन्म हुआ था। माता पार्वती की इच्छा शिवजी को पति के रुप में हासिल करने की थी। इसलिए उन्होंने अपने सौंदर्य से शिवजी को रिझाने का प्रयास किया था, जिसमें वे विफल रही थी। इसके बाद उन्होंने ध्यान-साधना से शिवजी के मन को हरा था। माना जाता है कि इसके बाद शिवरात्री के दिन ही शिवजी का माता पार्वती के साथ विवाह हुआ था। कुछ भक्त महाशिवरात्रि को शिव द्वारा अपने शत्रुओं पर विजय हासिल करने के दिन के रुप में भी मनाते हैं।

साधकों के लिए महाशिवरात्रि का दिन-

साधकों के लिए महाशिवरात्रि वह दिन है जब शिव कैलाश पवर्त में समा गए थे। इस दिन वे एक पर्वत की तरह स्थिर और निश्चल हो गए थे। योगी साधक शिव को कभी देवता की तरह नहीं पूजते। वे उन्हें आदि गुरु मानते हैं। आदिगुरु का अर्थ वो पहला गुरु है जिसने ज्ञान की उत्पत्ति की। ध्यान की बहुत अनेकों शताब्दी के बाद वे एक दिन पूर्व रुप से स्थिर हो गए। वो दिन महाशिवरात्रि का ही दिन था।

 शिवरात्रि को महा रात्रि क्यों कहा जाता है-

माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन एक शुभ श्रेष्ठ शिव योग, श्रीवत्स एवं अमृत योग बनता है।  इस योग में व्रत और अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। चल और अचल शिवलिंग में इसी रात शिव की शक्ति का संचार होता है। इसी लिए इसे महारात्रि भी कहा जाता है।

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