और अब बर्ड फ़्लू!

वुहान कोरोना, यूके कोरोना स्ट्रेन और अब कोरोना का साउथ अफ़्रीका स्ट्रेन आ गया है। इसके अलावा बर्ड फ़्लू का ख़तरा सामने है। ये क्या 2021 को भी खा जाएँगे? असल बात तो यह है, कि ये सब कारपोरेट के दाँव-पेंच हैं।

Updated On: Jan 8, 2021 14:08 IST

Dastak Online

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शम्भूनाथ शुक्ल

वुहान कोरोना, यूके कोरोना स्ट्रेन और अब कोरोना का साउथ अफ़्रीका स्ट्रेन आ गया है। इसके अलावा बर्ड फ़्लू का ख़तरा सामने है। ये क्या 2021 को भी खा जाएँगे? असल बात तो यह है, कि ये सब कारपोरेट के दाँव-पेंच हैं। मलेरिया और काला जार को जड़ से उखाड़ नहीं पाए, जिसके चलते देश में लाखों लोग हर साल मरते हैं और फ़िक्र है कोरोना की, बर्ड फ़्लू की। आज तक जो एलोपैथी जुक़ाम की कोई दवा नहीं ईजाद कर पायी, वह कोरोना के लिए टीका बना रही है। जबकि होम्यपैथी में जुक़ाम, गले में ख़राश की अद्भुत दवा है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए आयुर्वेद में अश्वगंधा है। मलेरिया के लिए सुदर्शन चूर्ण है। भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देश की सबसे बड़ी बीमारी है कोष्ठबद्धता, अर्थात् कोलाइटिस। इसके चक्कर में छोटी आँत कमजोर हो जाती है। नतीजा आँतों का कैंसर, अल्सर आदि। कोष्ठबद्धता का सबसे ख़राब असर आपके शरीर के संधि-स्थलों में पड़ता है। घुटनों की ख़राबी, हड्डियों में दर्द इस कोष्ठबद्धता की अनिवार्य देन है। पर ज़रा कोई बताएगा, कि एलोपैथी में इसकी कोई दवा है। सच बात तो यह है, कि एलोपैथी एक वैज्ञानिक अंधविश्वास है। कारपोरेट के लाभ के लिए एलोपैथी में शोध और विज्ञान का ड्रामा होता रहता है।

भारत में हर साल जाड़े में बर्ड फ़्लू की नौटंकी 2006 से शुरू हुई। अब कौन समझाए, इन बाँके बहादुरों को कि जब भी सर्दी अधिक पड़ेगी तब-तब पाला पड़ेगा। और पाला पड़ेगा तो कउआ, गौरैया, मुर्गी-मुर्ग़ा आदि पक्षी पाले से ठिठुर कर मरते ही हैं। पर नहीं मरते बगुले, बत्तख़, तीतर, बटेर, मोर और हंस। इसलिए पब्लिक में पैनिक मत फैलाओ ऐ विज्ञान के विक्रेताओ!

(ये लेखक के निजी विचार हैं। ये आर्टिकल शम्भूनाथ शुक्ल की फेसबुक पोस्ट से ली गयी है।शम्भूनाथ जी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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