पुरूष वर्चस्व को कायम रखती हैं गाजियाबाद जैसी घटनाएं

पितृसत्ता और पुरूष वर्चस्व कोई नया विषय नहीं हैं। सदियों से यह हमारे समाज में मौजूद रहा है और  सदियों से हम औरतें इस वर्चस्व से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। लेकिन आज बात केवल-मान सम्मान तक सीमित नहीं रही, आज बात महिला सुरक्षा की है।

Updated On: Jul 23, 2020 17:42 IST

Dastak Online

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Source : Google)

हिना

पितृसत्ता और पुरूष वर्चस्व कोई नया विषय नहीं हैं। सदियों से यह हमारे समाज में मौजूद रहा है और  सदियों से हम औरतें इस वर्चस्व से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। लेकिन आज बात केवल-मान सम्मान तक सीमित नहीं रही, आज बात महिला सुरक्षा की है। हमारे समाज में महिलाओं को देवी मानकर पूजा की जाती है, लेकिन क्या वास्तव में उसे इंसान भी माना जाता है?

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार हर पद्रंह मिनट में एक रेप केस दर्ज होता है। फिर भी आज हम कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स का नाम सुन कर सीना चौड़ा लेते हैं। लेकिन जब कोई और लड़की घर से बाहर कदम रखती है। तो पुरूषों की आंखे गिद्ध की तरह उसके बदन से चिपक जाती हैं। छेड़छाड़ तो बहुत आम बात है। हमारे समाज में बलात्कार के बाद भी आरोपी खुले घुमते रहते हैं और कोई प्रशासन कोई समाज उन पर लगाम नहीं लगा पाता। क्योंकि पाबंदियां समाज ने सिर्फ महिलाओं के लिए बनाई हैं।

हाल में यूपी के गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या से भारत के राज्यों में महिला सुरक्षा के सभी दावों की पोल खुल गई है। एक पत्रकार जिसकी भांजी को कुछ बदमाश परेशान कर रहे थे। वह कानून के पास जाता है क्योंकि उसे कानून पर भरोसा है। लेकिन प्रशासन न तो उस बेटी को एक सुरक्षित माहौल दे पाया और न ही उसके परिवार को सुरक्षा।

एन.सी.आर.बी जनवरी 2020  में कुछ आँकड़े जारी किए थे। जिसके अनुसार, महिलाओं के खिलाफ हो रहे, अपराधों में यूपी सबसे आगे है। यह आँकड़े 2018 में हुए अपराधों पर आधारित हैं। 2017- 2018 में केवल यूपी मे महिलाओं के खिलाफ 50,445 मामलें दर्ज किए गए थे।

अकेले यूपी में यह कोई एक घटना नहीं है जिसमें पीड़िता को या उसके परिजनों को धमकाया गया हो, या फिर सीधा मार दिया गया हो। ऐसी घटनाओं से अपराधियों के हौसलें बढ़ते हैं और पीड़िता का मनोबल टूट जाता है। परिणामतः या तो पीड़िता खुद आत्महत्या कर लेती है, या फिर किसी परिजन को नुकसान होने पर खुद को उसका जिम्मेदार मान कर,  इस कड़वी हकीक़त को स्वीकार कर लेती है, कि इस देश में महिलाओं की आवाज़ कभी सुनी ही नहीं जाती।

पिछले साल की ही बात है यूपी के उन्नाव के विधायक पर एक लड़की से बलात्कार करने का मामला सामने आया था।  कई दिनों तक कुलदीप सिंह सेंगर जेल से बाहर रहा। जिसके बाद उसने पीड़िता को धमकाया, उसके पिता को झूठे केस में पुलिस से इतना पिटवाया कि उनकी मृत्यु हो गई। चाचा को तिहाड़ भिजवा दिया। यहां तक सुनवाई से कुछ दिन पहले ही उसने पीड़िता की गाड़ी का एक्सीडेंट करवाकर उसे जान से मारने की कोशिश तक की। लेकिन क्योंकि यह मामला बहुत हाईलाइट में आ गया था। इसलिए प्रशासन को कार्यवाही करनी पड़ी और कुलदीप सिंह सेंगर को सज़ा मिली।

उन्नाव में ही एक लड़की को सिर्फ इसलिए जिंदा जला दिया गया, क्योंकि उसने उससे ऊंची जाति के लड़के से चुपके से शादी कर ली थी। बाद में लड़के ने अपने घरवालों की बातों में आकर उस लड़की को अपनाने से मना कर दिया। अपना अधिकार मांगने के लिए जब लड़की ने कानून की मदद लेनी चाही, तो उसे लड़के और उसके परिवार के कुछ मर्दों ने  जिंदा जला दिया। कुछ दिन तक मामला चर्चा में रहा। लेकिन उसके बाद उसके परिवार वालों को सज़ा हुई या नहीं। मामला कितना आगे बढा कोई नहीं जानता।

दिल्ली का सबसे बड़ा केस निर्भया जिसे पूरी मीडिया ने खूब दिखाया जिसके लिए लोग सड़को पर निकल कर इंसाफ मांग रहे थे। उसके मुख्य आरोपियों में से एक मुकेश सिंह ने बी.बी.सी डॉट कॉम की एक डॉक्यूमेंट्री इंडियाज़ डॉटर में बताया कि उसने निर्भया का रेप इसीलिए किया क्योंकि वो रात में एक लड़के के साथ घूम रही थी। उसने सूट-सलवार नहीं पहने थे। उसका कैरेक्टर अच्छा नहीं था। इसलिए हमने उसे सबक सिखाया।

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इन सब बातों से समाज का एक भयानक चेहरा सामने आता है जो समाज लड़की को केवल भोग की एक वस्तु मानता है। उसके कपड़ो को देख कर कैरेक्टर जज कर लेता है। पुरूषों का मेल-ईगो इतनी छोटा है कि न तो एक लड़की का इनकार सह सकता है और न ही उनका विरोध और न ही उनका मर्दों से ज्यादा कमाना। जो भी व्यक्ति महिलाओं के हक की बात करता है वो चाहें कोई और पुरूष ही क्यों न हो उसकी आवाज दबा दी जाती है। उसे यह पितृसत्तामक समाज नामर्द घोषित कर देता है। यहां मर्दानगी की परिभाषा औरतों से छेड़छाड करना, बलात्कार करना, मारना-पीटना और उन्हें अपने से नीचा दिखाना है।

अब कोई भी लड़की और उसके परिजन छेड़छाड और बलात्कार जैसी घटनाओं को पुलिस थाने में दर्ज कराने से कतराएंगे। उनकी बेटी या किसी परिजन की जान को खतरे हो सकता है, इस डर से वह ऐसे अपराधों को सहते रहने के लिए मजबूर हो जाएंगे। और यह पुरूषवादी सोच अपनी जड़े यू हीं जमाए रहेगी।

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