तुम्हारे शहर से जाने का मन के जरिए कवि दिनेश रघुवंशी ने छुआ लोगों के हृद्य को

"तुम्हारे शहर से जाने का मन है" के जरिए कवि दिनेश रघुवंशी आज के मौजूदा हालातों को बयां कर रहे हैं। जहां ये कविता खुदगर्ज हुए और चेहरों पर मुखौटे लगाए लोगों पर चोट करती है वहीं  सच्चे दोस्त में भरोसा भी जताती है। ये कविता सीधे लोगों के हृद्य को छू रही है। 

Updated On: Sep 25, 2020 13:49 IST

Dastak

Photo Source- Dinesh Raghuvanshi Channel

अजय चौधरी

25 साल पहले कवि दिनेश रघुवंशी ने ऐसी रचना लिख दी जिसे पढ़ो सुनो तो लगता है कि आज ही की बात है, आज से सैकडों वर्षों बाद भी कोई पढ़ेगा तो ऐसा ही लगेगा। "तुम्हारे शहर से जाने का मन है" के जरिए कवि रघुवंशी आज के मौजूदा हालातों को बयां कर रहे हैं। जहां ये कविता खुदगर्ज हुए और चेहरों पर मुखौटे लगाए लोगों पर चोट करती है वहीं  सच्ची दोस्ती में भरोसा भी जताती है। ये कविता सीधे लोगों के हृद्य को छू रही है।

अबसे पहले कभी सार्वजनिक मंच से इस कविता को नहीं सुनाया-

इस कविता के संदर्भ में कवि रघुवंशी से बातचीत करने पर उन्होंने बताया कि ये रचना उन्होंने 25 वर्ष पहले लिखी थी लेकिन कभी सार्वजनिक मंच से इसको नहीं सुनाया था। उन्होंने हाल ही में "दिनेश रघुवंशी ऑफिशियल" के नाम से अपना यूट्यूब चैनल बनाया है। उन्हें लगा कि ये रचना उन्हें लोगों के सम्मुख जरुर रखनी चाहिए, इसलिए अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से उन्होंने ये कविता पेश की। जिसके बाद उन्हें लोगों का बेहद प्यार इस रचना के सम्मुख देखने को मिल रहा है। उनसे गुजारिश की जा रही है कि वो काव्य मंचों पर भी इस रचना का पाठ आवश्य करें।

मित्र बोले आप हमें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे-

वो बताते हैं कि इस कविता को कोई सुन रहा है तो उसे लग रहा है कि मैं उसके मन की बात कर रहा हूं। उन्होंने बताया कि उन्हीं के गृह जिले फरीदाबाद में रहने वाले उनके एक मित्र इस कविता को सुनने के बाद इतने भावुक हो गए कि उन्होंने फोन मिलाकर कहा कि आप हमारे शहर से कहीं नहीं जाएंगे, हमशे कोई खता हुई है तो बताएं। वो कहते हैं कि मैंने जीवन में कुछ कमाया है तो वो बस मेरे अपनों का प्यार है, मैं उन्हें उस भावुक क्षण में बता भी नहीं पाया कि ये रचना तो मैंने 25 साल पहले लिखी थी और मैं इस शहर को छोड़कर कहीं नहीं जा रहा।

देखिए इस रचना से जुडी कवि दिनेश रघुवंशी की ये यूट्यूब वीडियो-

अगर आप पढ़कर इस कविता का आनंद लेना चाहते हैं तो वो भी हाजिर है-

तुम्हारे शहर से जाने का मन है यहाँ कोई भी तो अपना नहीं है

महक थी अपनी साँसों में,परों में हौसला भी था तुम्हारे शहर में आये तो हम कुछ ख्वाब लाये थे जमीं पर दूर तक बिखरे – जले पंखो ! तुम्हीं बोलो मिलाकर इत्र में भी मित्र कुछ तेजाब ले आये

बड़ा दिल रखते हैं लेकिन हकीकत सिर्फ है इतनी दिखाने के लिए ही बस ये हर रिश्ता निभाते हैं कि जब तक काम कोई भी न हो इनको किसी से तो न मिलने को बुलाते हैं, न मिलने खुद ही आते हैं

बहुत नजदीक जाकर देखने से जान पाये हम कोई चेहरे नहीं हैं ये मुखौटे ही मुखौटे हैं हमेशा ही बड़ी बातें तो करते रहते हैं हरदम पर इनकी सोच के भी क़द इन्हीं के क़द से छोटे हैं

कभी लगता है सारे लोग बाजीगर नहीं तो क्या मजे की बात है हमको करामाती समझते हैं हमेशा दूसरों के दिल से यूँ ही खेलने वाले बड़ा सबसे जहां में खुद को जज्बाती समझते हैं

शिकायत हमसे करते हैं कि दुनिया की तरह हमको समझदारी नहीं आती, वफ़ादारी नहीं आती हमें कुछ भी नहीं आता, मगर इतना तो आता है जमाने की तरह हमको अदाकारी नहीं आती

न जाने शहर है कैसा, न जाने लोग हैं कैसे किसी की चुप्पियों को भी ये कमज़ोरी समझते हैं बहुत बचकर, बहुत बचकर, बहुत बचकर चलो तो भी बिना मतलब, बिना मतलब, बिना मतलब उलझते हैं

शहर की इन फ़िजाओं में अजब-सी बात ये देखी खुला परिवेश है फिर भि घुटन महसूस होती है यहाँ अनचाहे- अनजाने से रिश्ते हैं बहुत लेकिन हर इक रिश्ते की आहट में चुभन महसूस होती है

बहुत मजबूर होकर हम अगर कोशिश करें तो भी तुम्हारे शहर में औरों के जैसे हो नहीं सकते बिछाता है कोई काँटे अगर राहों में तो भी हम किसी की राह में काँटे कभी भी बो नहीं सकते

मिलेंगे अब कहाँ अपने, जगेंगे क्या नए सपने बुझेगी अब कहाँ पर तिश्नगी ये किसलिए सोचें चलो खुद सौंप आएँ ज़िन्दगी के हाथ में खुद को कहाँ ले जाएगी फिर ज़िंदगी ये किसलिए सोचें

नये रस्ते, नये हमदम, नई मंजिल, नई दुनिया भले हो इम्तिहां कितने, कोई अब गम नहीं होंगे सफ़र यूँ ज़िन्दगी का रोज कम होता रहे तो भी सफ़र ज़िन्दादिली का उम्रभर अब कम नहीं होगा

यहाँ नफ़रत के दरिया हैं, यहाँ ज़हरीले बादल हैं यहाँ हम प्यार की एक बूँ द तक को भी तरसते हैं यहाँ से दूर, थोड़ी दूर, थोड़ी दूर जाने दो यहाँ हर कूचे में दीवानों पे पत्थर बरसते हैं

ऐ मेरे दोस्त ! तुम मरहम लिए बैठे रहो लेकिन जमाना जख्म भरने की इजाजत भी नहीं देगा हमें फ़ितरत पता है इस शहर की, ये शरीफ़ों को न जीने चैन से देगा, न मरने चैन से देगा

अगर अपना समझते हो तो मुझसे कुछ भी मत पूछो समाया है अभी दिल में गहन सागर का सन्नाटा किसी से कहना भी चाहें तो हम कुछ कह नहीं सकते हमें खामोश रखता है बहुत अन्दर का सन्नाटा

किसी को फ़र्क़ क्या पड़ता है जो हम खुद में तन्हा हैं किसी दिन शाख से पत्ते की तरह टूट भी जाएँ किसी से भी कभी ये सोच करके हम नहीं रूठे मनाने कौन आएगा, अगर हम रूठ भी जाएँ

तुम्हारे शहर के ये लोग, तुम इनको बताना तो भला औरों के क्या होंगे ये खुद अपने नहीं हैं मुसलसल पत्थरों में रहके पत्थर बन गए सब किसी की आँख में भी प्यार के सपने नहीं हैं

मुझे मालूम है ऐ दोस्त ! तुम ऐसे नहीं हो, पर तुम्हारा दिल दुखाकर मैं भला खुश कब रहूँगा मगर अब सर से ऊँचा उठ रहा है रोज पानी मैं अपने दिलपे पत्थर रखके बस तुमसे कहूँगा

(नोट:- ये रचना कवि दिनेश रघुवंशी के कॉपराईट के अधीन है, उनकी अनुमति के बिना इनका कहीं भी प्रयोग वर्जित है)

तुलसी की खेती से कैसे करें लाखों की कमाई

ताजा खबरें