हर लड़की को अपने यह अधिकार जरूर पता होने चाहिए

हमारे देश में लोग कानूनी तौर पर शिक्षित नहीं हैं और महिलाएं को कानूनी शिक्षा और उनसे जुड़े अधिकारों के बारे में जानकारी एकदम न के बराबर है। लेकिन लड़कियों को कुछ अधिकारों की जानकारी जरूर होनी चाहिए आइए जानते हैं रेप विक्टिम के कानूनी अधिकार क्या हैं।

Updated On: Sep 3, 2020 23:33 IST

Dastak Web Team

Photo Source: pikrepo

हिना 

हमारा देश अधिकत्तर अच्छी चीजों की रैंकिंग में निचले पायदानों पर होता है लेकिन जब बात अपराधों और विशेषतौर पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की होती है तो हमारा देश सबसे शीर्ष रैंकिंग पर नजर आता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक रेप के मामलों में भारत पूरे विश्व में तीसरे नम्बर पर आता है। हमारे देश में आए दिन बलात्कार होते रहते हैं नेशनल क्राइम ब्यूरो की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2018 में कुल 34 हजार बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। इस देश में महिलाएं हर सड़क और नुक्कड़ पर छेड़छाड़ का शिकार होती हैं। लेकिन जब तक किसी महिला का बलात्कार न हो जाए। हमारे समाज और प्रशासन के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। खैर, हमारे देश में लोग कानूनी तौर पर शिक्षित नहीं हैं और महिलाएं को कानूनी शिक्षा और उनसे जुड़े अधिकारों के बारे में जानकारी एकदम न के बराबर है। लेकिन लड़कियों को कुछ अधिकारों की जानकारी जरूर होनी चाहिए आइए जानते हैं क्या हैं रेप विक्टिम के कानूनी अधिकार।

जीरो एफआईआर का अधिकार-

जीरो एफआईआर का मतलब है कि रेप कहीं भी किसी गांव या छोटे-बड़े शहर में हुआ हो आप उसकी एफआईआर किसी भी जिले, शहर या दूसरे राज्य में करा सकती हैं। फर्ज कीजिए अगर गोवा में किसी महिला का बलात्कार होता है और किसी भी कारण से वो गोवा में किसी कारण के चलते एफआईआर दर्ज नहीं करा पाई, तो वह किसी दूसरे राज्य के किसी भी थाने में एफआईआर दर्ज करा सकती है। और थाना अधिकारी एफआईआर को उस शिकायत को दसरे राज्य की पुलिस को ट्रांसफर कर देगी।

किसी भी निजी अस्पताल में फ्री मेडिकल ट्रीटमेंट का अधिकार-

सेक्शन 357C कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर के तहत किसी भी रेप पीड़िता को फौरी तौर पर देने वाले मेडिकल ट्रीटमेंट न सिर्फ सरकारी अस्पाताल में बल्कि निजी अस्पताल में भी मुफ्त मिलेगा। अगर कोई अस्पताल ऐसा करने से मना करता है या पैसे की मांग करता है तो उस पर भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 166 B के तहत एक साल तक की सजा या जुर्माना या फिर दोनो हो सकते हैं

नो टू-फिंगर टेस्ट का अधिकार-

टू-फिंगर टेस्ट तो गैर-कानूनी बताते हुए कहा कि टू-फिंगर टेस्ट रेप सर्वाइवर के अधिकारों का उल्लंघन करता है यह टेस्ट किसी भी रेप सर्वाइवर की निजता का हनन है। इसलिए यह टेस्ट गैर-कानूनी है। किसी भी महिला जो बलात्कार पीड़ित है उसका टू-फिंगर टेस्ट नहीं हो सकता। टू-फिंगर टेस्ट में पीड़िता की योनि में डॉक्टर अपनी दो उंगलियां डाल कर यह टेस्ट करते थे कि सेक्शुअली एक्टिव है या नहीं। जिससे पीड़िता के चरित्र का हनन होता था।

हैरिसमेंट फ्री इंवेटीगेशन का अधिकार-

अकसर ही बलात्कार की रिपोर्ट लिखाते हुए या जांच के दौरान कई बार महिलाओं को हैरिसमेंट का भी सामना करना पड़ता है इसलिए कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर के सेक्शन 157 तहत बलात्कार पीड़िता को यह अधिकार है कि वह अगर चाहे तो थाने में अपना बयान दर्ज न कराए, वो जहां जिस जगह सहज महसूस करे उस जगह बयान दर्ज कराए। इसके लिए कोई भी महिला अधिकारी आपके इच्छानुसार स्थान व आपसे तय किए गये समय पर ही आयेगी। इसके अलावा कोर्ट में भी मजिस्ट्रेट सबके सामने बयान दर्ज नहीं कर सकती उसे एक अपने चैंबर में बहुत ही सहज तरीके से पीडिका का बयान दर्ज करना होगा।

इसके अलावा अगर पीड़िता शारीरिक और मानसिक तौर पर अपना बयान देने में असमर्थ है अगर वो इशारे से कुछ भी बताती है तो उसे एक विशेषज्ञ के द्वारा डि-कोड किया जाएगा और उसे ही बयान माना जाएगा। इस बयान को दर्ज कराने के बाद महिला को कठघरे में अपना बयान दोबारा दर्ज नहीं कराना पड़ेगा।

सुरक्षा, गरिमा व तेजी से ट्रायल का अधिकार

कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर के सेक्शन 26(a) यह अधिकार देता है कि जहां तक मुमकिन हो केस की सुनवाई महिला जज ही करे। और कोर्ट में केस के दौरान कोई भी ऐसा सवाल नहीं पूछा जा सकता जिससे पी़ड़िता का चरित्र हनन हो। आपके कितने मर्दों से संबध रहे, आप कितने बजे तक बाहर रहती है। या ऐसा कोई भी सवाल जिससे किसी महिला की गरिमा आहत हो। साथ ही केस सालों साल तक न खींचे। इसलिए सेक्शन 173(1A) तहत पुलिस को केवल 2 महीने में अपनी इंवेटीगेशन पूरी करके कोर्ट में रिपोर्ट देनी होगी। कोर्ट को भी दो महीन के भीतर अपनी कार्यवाही पूरी करने को कहा गया है। बलात्कार के मामलों की जल्द से जल्द सुनवाई के लिए स्पेशल फास्ट ट्रेक कोर्ट बनाए गए हैं जिससे जल्दी से जल्दी कार्यवाही को पूरा किया जा सके।

कार्यवाही के दौरान पीड़िता की सुरक्षा को सुनिश्चित किया गया है और यह आपका अधिकार है कि सुरक्षा कारणों के चलते आपको पुलिस घर से कोर्ट लाए और कोर्ट से घर लेकर जाए। जिससे आपको और आपके गंवाहों को कोई धमका न सके। साथ ही आरोपी और पीड़िता का कोर्ट में आमना-सामना भी नहीं होगा। और न ही आरोपी का वकील सीधे पी़ड़िता से कई सवाल कर सकता है।

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