इतिहास उन लोगों को कैसे याद करेगा?

किसान अपने पक्के इरादों से और कई सालों की तैयारी के साथ देश की राजधानी में आए थे। बड़ी संख्या में देश के किसान अपनी फसलों पर टैक्ट्रर चला उसे बर्बाद कर रहे थे। अकेले 2021 में ही किसान आंंदोलन में सैंकडों किसान अपनी जान गवां चुके थे लेकिन उस वक्त पत्रकारिता सत्ता के हाथों का खिलौना बनकर रह गई थी।

Updated On: Apr 2, 2021 10:34 IST

Dastak

Photo Source- Social Media

अजय चौधरी

इतिहास उन लोगों को ऐसे याद करेगा- जब देश का किसान रण में उतरा था और सडक पर बैठकर अपनी भावी पीढ़ी के लिए युद्ध लड़ रहा था। उस वक्त दमनकारी सत्ता के पक्षधारी लोग किसानों को आतंकी घोषित कर उनके विरुद्ध जहर उगलने का काम कर रहे थे।

दूसरी तरफ किसान अपने पक्के इरादों से और कई सालों की तैयारी के साथ देश की राजधानी में आए थे। बड़ी संख्या में देश के किसान अपनी फसलों पर टैक्ट्रर चला उसे बर्बाद कर रहे थे। अकेले 2021 में ही किसान आंंदोलन में सैंकडों किसान अपनी जान गवां चुके थे लेकिन उस वक्त पत्रकारिता सत्ता के हाथों का खिलौना बनकर रह गई थी।

बड़े समाचार चैनलों और अखबारों से किसानों की खबरें गायब थी। एक तरह से चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया द्वारा उस वक्त किसान आंदोलन से दूरी बना ली गई थी। वो किसान आंदोलन को लेकर सत्ता समर्थित खबर दिखाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही थी।

मनरेगा में रिकॉर्ड 11 करोड़ मजदूर हुए पंजिकृत, तालाबंदी के दौरान हुए पलायन का असर

लेकिन सोशल मीडिया उस वक्त काफी तेजी से उभर रहा था और किसानों का मुख्य हथियार भी वही बना। लेकिन धीरे धीरे सोशल मीडिया पर भी सरकारी शिकंजा कसना शुरु हो गया और उसे पिंजरे का पंछी बनाने की कवायद तेज हो गई.....

ताजा खबरें