मैं कानपुर वाला!

कानपुर की पहचान विकास दुबे नहीं है, गणेश शंकर विद्यार्थी और हसरत मोहानी का है, यह शहर। लेकिन विकास दुबे को काउंटर करने के लिए पिछले 50 वर्षों में पनपे किसी भी हीरो को नहीं तलाशा गया।

Updated On: Jul 14, 2020 20:08 IST

Dastak

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शंभूनाथ शुक्ल

आज के समाज की परेशानी यह है, कि हम अच्छाई अतीत में तलाशते हैं और बुराई वर्तमान में। हमने विकास दुबे के बारे में सुना और मान लिया, कि कानपुर में अब तो बस विकास दुबे टाइप के लोग ही रहते हैं। फ़ौरन जवाब आया, कि नहीं कानपुर की पहचान विकास दुबे नहीं है, गणेश शंकर विद्यार्थी और हसरत मोहानी का है, यह शहर। लेकिन विकास दुबे को काउंटर करने के लिए पिछले 50 वर्षों में पनपे किसी भी हीरो को नहीं तलाशा गया। मैं कहता हूँ, यह शहर लक्ष्मी सहगल का है, कामरेड रामासरे का है। सुभाषिणी अली का है। यह शहर राजेंद्र राव और प्रियंवद का है। यह शहर हरी नारायण निगम और विजय किशोर मानव का है।

इसी शहर में सुनील दुबे हुए, देवप्रिय अवस्थी हुए। यहीं पर कामता नाथ ने काल कथा को लिखना शुरू किया। यहीं पर विश्वप्रसिद्ध साहित्यकार गिरिराज किशोर ने अपना सारा लेखन किया। ललित मोहन अवस्थी और बलराम तथा संतोष तिवारी हुए। यहीं पर श्रीनाथ अरोड़ा और सुनील कौशिश ने लिखना सीखा। यहीं पर विष्णु त्रिपाठी जैसे जुझारू पत्रकार हुए, जो आज भी कानपुर के अमर उजाला में 'कंपू कथा' नाम से कालम लिखते हैं। और जिनके कंठ में कानपुर बसता है।

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यहीं पर अनूप शुक्ल हैं, जो कानपुर के इनसाइक्लोपीडिया हैं। और अपने अनूठे अन्दाज़ में कानपुर को साइकिल पर लाद कर चलने वाले ऑर्डिनेंस फ़ैक्टरी के जीएम अनूप शुक्ल हैं। विजय त्रिपाठी जैसे मस्त मौला संपादक यहीं पर बसते और बैठते हैं। यहीं पर देवनारायण अग्निहोत्री हुए, श्याम मिश्र, केजी तिवारी, ब्रजेंद्र शुक्ल, डॉक्टर जेबी सिंह हुए। विमल मेहरोत्रा इसी शहर के थे। राम स्वरूप वर्मा जैसे समाजवादी हुए। यहीं एक कवि दया शंकर दीक्षित ‘देहाती’ हुए, जिन्होंने सर पद्मपति सिंघानिया के बंगले पर कविता पढ़ी-

“सर मारिस है लट्ठ जो, ताहि कहत हरिदूत। क्यों कमला वाहन भये, कमलापत के पूत।।”

दरअसल कानपुर के कलेक्टर सर मौरिस हैलेट ने साइमन कमीशन का विरोध करने वाले कांग्रेसियों के सर पर लाठियाँ भँजवाईं थीं। किंतु नगर सेठ पद्मपति सिंघनिया ने सर की पदवी पाने के लिए हैलेट को इंजील (देवदूत) बताया था। उन्हीं जेके समूह के मालिक पद्मपति सिंघानिया के बंगले में हुए कवि सम्मेलन में देहाती जी ने यह कविता पढ़ी और इस तरह पद्मपति सिंघानिया को उल्लू कह दिया। वे देखते रह गए। एक ऐसे शहर की पहचान न कल किसी गुंडे की थी न आज है न कल होगी।

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(ये लेखक के निजी विचार हैं, जिन्हें उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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