ठेके पर सरकार !

स्वतंत्रता के पश्चात से ही सरकारी महकमों की वर्ग (ग) और (घ) सेवा की श्रेणी सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाली रही है। एक और बात जो ध्यान रखने योग्य है वो यह कि किसी कार्यालय में इन दोनों वर्ग के लोग हीं 50% से अधिक शारीरिक और मानसिक श्रम कर देते हैं।

Updated On: Sep 18, 2020 18:04 IST

Dastak

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श्रुति जयराज सिंह

स्वतंत्रता के पश्चात से ही सरकारी महकमों की वर्ग (ग) और (घ) सेवा की श्रेणी सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाली रही है। एक और बात जो ध्यान रखने योग्य है वो यह कि किसी कार्यालय में इन दोनों वर्ग के लोग हीं 50% से अधिक शारीरिक और मानसिक श्रम कर देते हैं। वर्ग (क) और (ख) के लोग हस्ताक्षरकर्ता और निर्णय लेने वाले होते हैं।

परन्तु, पिछले कुछ वर्षों से विशेष परिवर्तन हो रहा है, सरकार क्रमिक रूप से ग्रुप (ग) और (घ) की सेवाओं को आउटसोर्स कर रही है यानी ठेके पर दे रही है। ग्रुप (घ) को समाप्त कर दिया गया है और वर्ग (ग) में ही एक एम.टी.एस (मल्टी टास्किंग स्टाफ) पद का सृजन किया गया है। पूर्व में ड्राईवर, माली, चपरासी, रसोइया आदि कई तरह के पद होते थे, जो अब कुछ ही विभागों में हैं जिनमे पहले के लोग हैं। अब इन सब पदों को एम.टी.एस के अंतर्गत ले आया गया है। इस पद पर नियोजित व्यक्ति से कोई भी कार्य लिया जा सकता है। और ऐसा भी नहीं है कि पहले जितने पद थे उनके बराबर ही एम.टी.एस के पद बनाये गए। यह काफी कम कर दिये गए। इसके पीछे सरकार की एक व्यवस्थित सोच रही है कि इस निर्णय से सरकार पर आर्थिक दबाव कम होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि एम.टी.एस का कार्य अगर ठेके पर दे दिया जाए तो जिस काम के लिए एक स्थायी नियोजित व्यक्ति को वेतन-भत्ते मिलाकर लगभग 30000 रुपये देने पड़ते हैं वह 10 से 12 हज़ार में ही हो जाएगा‌। कई अर्थशास्त्री इस निर्णय को उचित और आर्थिक हित में मानते हैं, पर भारत जैसे लोककल्याणकारी राज्य जो खुद को समाजवादी भी मानता है के लिए यह कहाँ तक उचित है ? एक पढ़ा-लिखा समझदार आदमी स्वयं सोच सकता है कि क्या इस निर्णय से सामजिक और आर्थिक न्याय मिल सकता है जो कि प्रस्तावना में वर्णित है?

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इतना ही नहीं, कुछ और गौर करने वाली बातें हैं जैसे- सरकारी महकमे चाहे तो सीधे तौर पर किसी व्यक्ति को ठेके पर काम पर रख सकते हैं पर सामान्यतः ऐसा नहीं किया जाता और किसी बिचौलिए (कंपनी या व्यक्ति) के माध्यम से ठेके पर लोग रखे जाते हैं. इसका सीधा लाभ यह होता है कि ठेके पर नियोजित व्यक्ति के श्रम अधिकारों को पूरा करने का दायित्व सरकार पर न रहकर ठेकेदार का हो जाता है। यह अलग बात है कि श्रम नियमों को पालन करवाने के लिए श्रम मंत्रालय और विभाग हैं, जो कागजी तौर पर नियमों का अक्षरश: पालन करवाते दिखते हैं, भले ही सच्चाई कुछ और हो। इस तरह सरकार अपना पल्ला छुड़ा लेती है. ठेके पर नियोजित व्यक्ति को अपने नौकरी कच्ची होने की चिंता होती है, उसे जब भी ठेकेदार/नियोजक चाहे तो निकाल सकता है। उसे उतनी छुट्टियाँ और भत्ते नहीं मिलते जितने कि एक स्थायी नियोजित व्यक्ति को मिलते है और न ही भविष्य सुरक्षित रहने की कोई आशा। एक तरह से देखा जाए तो यह सरकार के निजीकरण का प्रयास है।

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सरकार इसे उचित मानते हुए अब ठेके की व्यवस्था केवल (ग) और (घ) वर्ग के लिए ही नहीं बल्कि शिक्षक, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजिनियर आदि के कार्य को भी ठेके पर दे रही है। इस सबसे भले ही आर्थिक तौर पर थोड़ी बहुत मजबूती पायी जा सकती है, पर मानव विकास के हर पहलू को प्राप्त करना संभव नहीं है। और तो और वर्तमान सरकार तो इन चिंताजनक पहलूओं पर गौर करने के बजाये जाति, धर्म, मंदिर, मस्जिद के मुद्दे पर लगी है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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