बीएसपी का अर्श से फर्श तक का सफर, मायावती कैसे 10 सालों में राजनीति के निचले पायदान पर पहुंच गई?

बहुजन समाज पार्टी (BSP) जिसकी सुप्रीमो मायावती (Mayawati) हैं, ये पार्टी कैसे पिछले 10 सालों में अर्श से फर्श तक का सफर तय कर रही है। 206 विधायकों की ये पार्टी कैसे केवल सात विधायकों में सिमट कर रह जाती है।

Updated On: Jun 5, 2021 12:04 IST

Dastak

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जावेद इकबाल

बहुजन समाज पार्टी (BSP) जिसकी सुप्रीमो मायावती (Mayawati) हैं, ये पार्टी कैसे पिछले 10 सालों में अर्श से फर्श तक का सफर तय कर रही है। 206 विधायकों की ये पार्टी कैसे केवल सात विधायकों में सिमट कर रह जाती है। इसपर बात करते हैं लेकिन पहले हालिया घटनाक्रम पर नजर मार लेते हैं। गुरुवार को मायावती ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया है, उन्होंने उत्तरप्रदेश के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर और मौजूदा विधान मंडल में विधायक दल के नेता लालजी वर्मा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

बहनजी के इस कदम से उनकी पार्टी की स्थिति और नाजुक हो गई है। अगर मायावती पार्टी को उभारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती तो उत्तरप्रदेश के आने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी की स्थिती और खराब होने की संभावना है। यूपी में बसपा को सत्ता में लाने का श्रेय दलित, पिछड़ा और ब्राह्मण गठजोड़ माना जाता था। एक समय पार्टी कैबिनेट में नसीमुद्दीन सिद्दीकी इंद्रजीत सरोज बाबू सिंह कुशवाहा धर्म सिंह सैनी चौधरी लक्ष्मी नारायण जैसे नेता थे। आज आलय है कि बीते समय के बसपा के पास आज केवल तीन मुख्य नेता ही हैं। जिनमें निखिल दुबे, सुधीर गोयल और सुखदेव। राजभर शामिल हैं। बाकि के तमाम नेता या तो खुद पार्टी से बाहर हो गए या फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

बसपा की नींव रखने वाले कांशीराम ने सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाते हुए विभिन्न जातियों से नेताओं का चुनाव कर उन्हें उस बिरादरी का राजनीतिक चेहरा बनाने का काम किया था। उनमें ओमप्रकाश राजभर अपनी बिरादरी के सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे थे। जबकि आरे के चौधरी भी पूर्वी उत्तरप्रदेश में दलित समाज का बड़ा चेहरा बनकर उभरे थे। इसी तरह खेती-बाड़ी करने वाली जातियों जैसे कोरी कुर्मी के नेता के तौर पर कांशीराम ने सोनेलाल पटेल की पहचान बनवाई थी। मगर 2012 में सत्ता से बाहर होने के बाद से ही पार्टी को शिखर पर पहुंचाने वाले इन जातियों के नेताओं ने बीएसपी से किनारा करना शुरू कर दिया था।

इसके बाद पार्टी लगातार कमजोर होती गई। शायद यही वजह है कि 2012 में सत्ता में बाहर हुई पार्टी 2014 के चुनाव में लोकसभा चुनाव में 1 भी सीट नही जीत सकी। बाबू सिंह कुशवाहा का 2011 में घोटाले में नाम आने के बाद बीएसपी सरकार ने उन्हें मंत्री पद से हटा दिया फिर उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव से स्वयं को अलग कर लिया वहीं दूसरी ओर 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन विधानसभा के विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी से इस्तीफा देकर बीजेपी ज्वाइन कर ली। इसका असर पार्टी की परफॉर्मेंस पर दिखा और विधानसभा में पार्टी के सदस्यों की संख्या 19 रह गई। बाद में एक विधायक रितेश पांडे 2019 में लोकसभा चुनाव लड़े और जीते।

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इसके बाद विधानसभा उपचुनाव में ये सीट भी बीएसपी के हाथ से निकल गई। वही राज्यसभा चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने पर बीएसपी ने अपने 7 विधायक निलंबित कर दिया। इससे पहले 2 विधायक को पार्टी पहले ही निलंबित कर चुकी थी और अब पार्टी में विधायकों की संख्या 7 ही बची है।

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