भारत-चीन विवाद पर साथ आने की बजाय चल रही राजनीति, लोकतंत्र पर बड़ा खतरा

आज के भारत को देखकर मुझे दुख होता है कि प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, गृहमंत्री के ट्वीटर हैंडल पर अपने देश के शहीद सपूतों के लिए श्रद्धांजलि तक नहीं है, देशवासियों के लिए एक औपचारिक संदेश तक नहीं है कि भारत-चीन सीमा पर हुए हिंसक संघर्ष को लेकर किसी तरह की चिंता न करें।

Updated On: Jun 17, 2020 10:44 IST

Dastak Online

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प्रमेंद्रा मोहन

20 नवंबर 1962 को पंडित नेहरू ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया था, जिसमें चीन के भारत पर थोपे गए युद्ध के बारे में उन्होंने देश को बताया था। इसी युद्ध पर फिल्म बनी थी हकीकत.. जिसका एक गाना अमर हो गया..है तुम्हारे हवाले वतन साथियों। जिन्होंने ये फिल्म देखी होगी, उन्हें इसका पूरा अंदाज़ा होगा कि जब भारत के पास सैन्य साजो-सामान नहीं थे, युद्ध का न अनुमान था, न तैयारी थी, इसके बावजूद हौसले के दम पर भारतीय सेना ने अपनी कम संख्या के बावजूद टिड्डियों की तरह अंतहीन दिखने वाले चीनी सैनिकों से किस बुलंदी से लोहा लिया था। पूरा देश सेना के पीछे खड़ा था और नेहरू ने इसी युद्ध में आरएसएस को भी साथ लिया था, उसकी देशसेवा की सार्वजनिक प्रशंसा भी की थी और परेड में भी आमंत्रित किया था।

भारत-चीन विवाद पर चुप हैं सभी-

आज के भारत को देखकर मुझे दुख होता है कि प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, गृहमंत्री के ट्वीटर हैंडल पर अपने देश के शहीद सपूतों के लिए श्रद्धांजलि तक नहीं है, देशवासियों के लिए एक औपचारिक संदेश तक नहीं है कि भारत-चीन सीमा पर हुए हिंसक संघर्ष को लेकर किसी तरह की चिंता न करें, हमारी सेनाएं सतर्क हैं, सक्षम हैं। दूसरी ओर कांग्रेस, इस संकट की घड़ी में भी राजनीतिक स्कोर सेट करने में जुटी है, सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री मोदी का हैशटैग ट्विटर पर टॉप ट्रेंड कराया जाता है। जब युद्ध की आहट पर ही देश में इस हद तक विश्वास की कमी दिख रही है तो युद्ध होने पर क्या होगा, ये मुझे विचलित करता है। राजनीति करें, बिल्कुल करें..राजनीतिक दलों का काम ही यही है, लेकिन राजनीति को देश से ऊपर न समझने लग जाएं..जिस भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती को हम सलाम किया करते थे, वो गुम हो चुकी है और सत्तापक्ष हो या विपक्ष, अब लोकतंत्र के दो किरदार नहीं रहे, बल्कि दोनों ने अपने बीच एक ऐसी खाई खोद ली है, जिसमें लोकतंत्र गिरता चला जा रहा है। सेना की पुष्टि के बावजूद सरकार के शीर्ष जिम्मेदार राजनीतिक रसूख की चिंता में ट्वीट तक पर अनिर्णय में है तो विपक्ष को लग रहा है कि मौका पर चौका का वक्त है। अगर राजनीति का स्तर ऐसे ही रहा तो स्थितियां बिगड़ेंगी और खामियाजा देश भुगतेगा। इसपर भी चिंतन की जरूरत है....

संकट में देश का एक मंत्र हो राष्ट्र सर्वोपरि-

संकट में देश का एक मंत्र होना चाहिए...राष्ट्र सर्वोपरि..ये मामूली बात नहीं है कि हमारे 20 सपूत शहीद हो गए हैं। चीन के भी 43 मारे जाने की सूत्रों के हवाले से खबर चल रही है, हालांकि भारतीय सेना या भारत सरकार के आधिकारिक बयान तक मैं इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहता क्योंकि ये चीन की खुद को विक्टिम दिखाने की चालबाज़ी भी हो सकती है। वो भारत पर ही मौजूदा स्थिति का दोष मढ़ने का कूटनीतिक पैंतरा अपना ही रहा है। अपने पिछले आलेख में मैंने लिखा भी था कि चीन की अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही है, कोरोना में वहां के नेतृत्व ने बुरी तरह भरोसा गंवाया है, अब चीन से कारोबार समेटने का दौर चल रहा है, ऐसे में वो भारत को बार-बार उकसा रहा है ताकि अपने देश में चीनी अस्मिता और दुनिया को अपनी ताकत बरकरार रखने का संदेश दे सके। सीमा पर आई मौजूदा स्थिति एक दिन की नहीं है, चीन की ओर से लगातार कोशिशें की जा रही थीं और भारत की ओर से बातचीत के जरिये विवाद सुलझाने या कम से कम टालते रहने की कोशिश हो रही थी। सवाल ये है कि हमें क्या करना चाहिए? मेरा जवाब है इस वक्त सेना का मनोबल पूरी ताकत और एकजुटता के साथ बनाए रखना चाहिए। राजनीतिक नेतृत्व को पूरी ताकत से चीन की कूटनीतिक चालों और अगर वो युद्ध पर आमादा ही हो तो उस क्षेत्र में निपटने की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित करने देना चाहिए। मैं फिर कहूंगा कि नेहरू, इंदिरा, मोदी, राहुल करते रहने के लिए बहुत वक्त मिलेगा, लेकिन जब देश के सामने चीन जैसे खतरनाक और शातिर पड़ोसी का ख़तरा मंडरा रहा है तो अभी सिर्फ भारत माता की जय बोलिए। भारतीय सेना ज़िंदाबाद बोलिए। भारत ने कभी अपनी ओर से किसी पर युद्ध नहीं थोपा है, लेकिन 2020 का भारत किसी के युद्ध थोपने पर खामोश भी नहीं बैठने वाला है। अपनी सेनाओं पर भरोसा रखें, जो भी फैसला सरकार लेगी, हमारी सेनाएं उसके लिए सक्षम हैं।

कोरोना पर भी राजनीति-

मैंने कोरोना आपदा पर भी कहा था कि ये वायरस किसकी सरकार और कौन नेता देखकर नहीं हमला करता बल्कि जो जैसी पिच मुहैया कराता है, वैसी बैटिंग करता है, इसलिए राजनीति न करें, मिलकर काम करें। न राजनीतिक पार्टियों ने ऐसा किया, न समर्थकों ने, नतीजा आपके सामने है, पहले कोरोना को हराने की बात थी, फिर कोरोना के साथ जीना सीखने की बात होने लगी और अब कोरोना के साथ मरते जाने के लिए सरकारों ने छोड़ दिया है। मैं फिर कहूंगा कि चीन कोई पाकिस्तान नहीं है, ये खतरा बड़ा है, युद्ध में जाने की स्थिति नहीं है, लेकिन जाना ही पड़ा तो हमारी अंदरुनी राजनीति और देशहित, जनहित से भी बढ़कर दलहित को समझने की सोच हमें बड़ी मुसीबत में डाल सकती है, इसलिए संयम रखें, अनावश्यक तनाव बनाने से बचें।

उपरोक्त विचार लेखक के निजी विचार हैंलेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वो ज़ी न्यूज़इंडिया टीवी और आजतक आदि संस्थानों में अहम पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

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