महकमे में दीमक की तरह है पुलिस उत्पीड़न, दोषी पुलिसकर्मियों पर नहीं होती सख्त कार्यवाही

पुलिस उत्पीड़न की कहानी सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है ये तो वो दीमक है जो पूरे महकमे को खोखला करता जा रहा है। पुलिस उत्पीड़न के मामले सामने आने पर कार्यवाही के नाम पर संबधित पुलिसकर्मी का तबादला या फिर उसे सस्पेंड कर दिया जाता है। लेकिन कोई बडी सजा नहीं दी जाती।

Updated On: Jul 20, 2020 23:46 IST

Dastak

Photo Source- Pixabay

हिना

बचपन में हमें पढ़ाया जाता है कि सेना देश की रक्षा के लिए होती है और पुलिस देश के आम नागरिकों की सेवा के लिए। लेकिन बीते कुछ समय से जिस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। उससे रक्षक की भूमिका में नज़र आने वाली पुलिस अब भक्षक लगने लगी है। पुलिस उत्पीड़न की कहानी सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है ये तो वो दीमक है जो पूरे महकमे को खोखला करती जा रहा है। पुलिस उत्पीड़न के मामले सामने आने पर कार्यवाही के नाम पर संबधित पुलिसकर्मी का तबादला या फिर उसे सस्पेंड कर दिया जाता है। घटना चाहे कितनी भी बड़ी हो कार्यवाही के नाम पर इतना ही होता है। आपने शायद ही कभी ऐसा सुना हो कि किसी पुलिसकर्मी को किसी को सताने के नाम पर जेल में डाल दिया गया है, क्योंकि यहां ऐसा होता ही नहीं है।

दिल्ली दंगों में सामने आया था पुलिस का अलग चेहरा-

दिल्ली में कुछ महीनों पहले दंगों के दौरान कई ऐसे वीडियो सामने आए, जो पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं। एक वीडियो में कुछ पुलिस वालों ने चार-पांच घायल लोगों को गिरा कर जबरन जन-गन-मन गाने को कहा। जिसमें कुछ लोग गंभीर रूप से घायल हुए और कुछ लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। उनमें से कुछ पुलिसकर्मियों को यह तक कहते हुए सुना जा सकता है कि "लो आजादी, तुम्हें आजादी चाहिए न, हम देंगे तुम्हें आजादी"। मीडिया रिपोर्टस के अनुसार जिन लोगों को मारा गया था। उनमें से कोई भी दंगे में शामिल नहीं था। इसके आलावा दंगों के दौरान पुलिस केवल तमाशबीन बनकर खड़ी रही और दंगाई अपना आंतक मचाते रहे।

पालघर में भी सामने आई पुलिस की गैर-जिम्मेदाराना छवि-

दिल्ली दंगो के कुछ दिनों के बाद ही भारत में देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हो गई। इस लॉकडाउन में भी मुंबई के पालघर पुलिस थाने के समाने सैंकडों लोगों ने इक्ट्ठा होकर दो साधुओं की  हत्या कर दी। यहां भी पुलिस की एक गैर-जिम्मेदाराना छवि लोगों के सामने आई। इस घटना में पहला सवाल तो पुलिस पर यह खड़ा हो रहा था कि जब संपूर्ण देश में लॉकडाउन है तो इतनी बड़ी संख्या में लोग पुलिस थाने के बाहर इक्ट्ठा कैसे हुए? दूसरा सवाल यह कि जब साधू थाने से निकल रहे थे और पुलिस यह देख रही थी कि भीड़ इन पर हमला करने वाली है तो साधुओं को पुलिस सुरक्षा क्यों नहीं दी गई। पुलिस सुरक्षा देने की बजाए मौजूदा कॉन्सटेबल ने साधु को भीड़ के हवाले कर दिया और मौके पर ही साधुओं और उनके एक साथी ने दम तोड़ दिया।

पुलिस हमारी सुरक्षा करने का दावा तो करती है। लेकिन अगर इस तरह की घटनाओं को देखें,  तो यह बात अपने आप में सिर्फ एक जुमला नज़र आती है। हाल ही के कुछ ऐसे मामलों से यह साफ हो जाता है कि अलग-अलग कारणों से पुलिस अधिकत्तर न्याय करना तो दूर, या तो अपराध करने वाले की साथी बन जाती है या फिर खुद एक बेरहम अपराधी बन जाती है।

गुना में पुलिस ने गरीब किसान के खेत में चला दिया था बुलडोज़र-

पिछले दिनों मध्यप्रदेश के गुना जिले में एक गरीब किसान के खेत में पुलिस प्रशासन ने बुलडोज़र चला दिया। बताया जा रहा है कि कई दिनों से यह ज़मीन खाली पड़ी थी और इस जमीन को किसी व्यक्ति ने इन दोनो पति-पत्नी को पट्टे पर खेती करने के लिए दिया था। राजकुमार और सावित्री (पीड़ित पति-पत्नी)  ने पुलिस प्रशासन को समझाने की कोशिश की। कि वह फसल की कटाई तक रूक जाए। लेकिन पुलिस ने खेत पर बूलडो़ज़र चला दिया। विरोध करने पर उन्होंने दंपत्ति की खूब पिटाई की और मजबूरन दोनों ने कीटनाशक पी लिया। दोनों को गले लगा कर रोते हुए बच्चों की तस्वीर व वीडियो वायरल हो गई जिसके बाद मामले को संज्ञान में लिया गया।

अगर वो जमीन सरकारी थी, तो सबसे पहले तो पुलिस को उस आदमी को गिरफ्तार करना चाहिए था। जिसने इस दंपत्ति को जमीन पट्टे पर दी थी। राजकुमार एक धोखे का शिकार हुआ था। जो जमीन उसने पट्टे पर ली, वो सरकारी निकली तो इसमें किसका दोष था?  कर्ज लेकर लाखों रुपए खर्च करने के बाद जब उस जमीन पर सोयाबीन की फसल लगभग तैयार हो गई, तब प्रशासन हरकत में आया! लाखों का नुकसान होते देख राजकुमार ने पुलिस से गुहार लगाई, कि वह फसल की कटाई होने तक रुक जाएं उसके बाद, वह यह जमीन खाली कर देंगे। लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी।

तमिलनाडु में पुलिस कस्टडी में हुई थी पिता-पुत्र की मौत-

पुलिस का रवैया लोगों के लिए इतना क्रूर हो सकता है यह सोच कर दिल दहल जाता है। पुलिस का सबसे भयानक चेहरा तमिलना़डू के तूतीकोरिन जिले में सामने आया।  जब एक पिता और बेटे की शकुंतलम पुलिस स्टेशन में यौन उत्पीड़न कर दोनों की जान ले ली। उन दोनो में से पिता का कसूर इतना था कि पेट्रोलिंग पर आए एक पुलिसकर्मी से उसकी बहस हो गई थी और जब पिता को देखने बेटा थाने गया तो अपने पिता के हालात देखकर विरोध करते समय एक पुलिस वाले को धक्का दे दिया। पुलिस वालों ने उसके बाद दोनों पिता और बेटे को रात भर थर्ड डिग्री से भी भयंकर टॉर्चर दिया। गुदा में लाठी डालने के कारण दोनों की लुंगिया खून में पूरी तरह भीग चुकी थी और दोनों की मौत हो गई।

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जनता पुलिस के पास जाने से भी कतराती है-

इन सभी घटनाओं में दोषी पुलिसकर्मी सिर्फ सस्पेंड और ट्रांसफर किया गया। यह तो केवल गिनी-चुनी घटनाएं है सालों से समय-समय पर पुलिस का यह रूप देश को दहला देता है। जिससे जनता और पुलिस प्रशासन के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी हो जाती है जिससे अगर जनता के साथ कोई अपराध भी होता है तो लोग पुलिस के पास नहीं जाते। जिससे अपराध और अपराधियों को और बढ़ावा मिलता है। ऐसे अत्याचार किसी एक कारण से नहीं होते। कई बार किसी पुलिस का पूर्वाग्रह,  बाहुबलियों का प्रभाव, उनके निजी लालाच व कभी किसी एक पक्ष के ज्यादा मजबूत होने के कारण पुलिस के ऐसे घिनौने चेहरे सामने आते रहते हैं।

अपराधी पुलिसकर्मियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले-

हालाकि ऐसा नहीं है कि सभी पुलिस अधिकारी एक जैसे नहीं होते। लेकिन कहते हैं कि "एक मछली सारे तलाब को गंदा कर देती है" इन गंदी मछलियों को केवल सस्पेंड करने से काम नहीं चलेगा। ऐसे पुलिसकर्मियों पर हत्या या हत्या की कोशिश के मामले दर्ज होने चाहिए और सबको कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए।

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