टिकट कंफ्यूजन को लेकर पार्टियां कर रहीं राजनीति

आपने देखा होगा कि कुछ नेता वीडियो कांफ्रेंसिंग में भी मास्क लगाए दिखते हैं, मानो कोविड-19 कोई ऐसा कंप्यूटर वायरस है, जो सिस्टम से निकलकर सामने वाले को संक्रमित कर सकता है!

Updated On: May 12, 2020 13:41 IST

Dastak Online

Photo Source : Twitter

प्रमेंद्रा मोहन

आपने देखा होगा कि कुछ नेता वीडियो कांफ्रेंसिंग में भी मास्क लगाए दिखते हैं, मानो कोविड-19 कोई ऐसा कंप्यूटर वायरस है, जो सिस्टम से निकलकर सामने वाले को संक्रमित कर सकता है!

राजनीति का नया नजरिया-

तो एक ये दौर है और एक वो दौर था जब 1935 में बोरसद में प्लेग रोगियों के बीच सरदार पटेल सेवा में जुटे थे या दक्षिण अफ्रीकी हिंदुस्तानी बस्तियों में प्लेग रोगियों के बीच गांधी सेवा और सफाई में या फिर साबरमती आश्रम में कुष्ठ रोगियों की सेवा करते थे। ये दोनों बड़े वकील थे, गांधी अफ्रीका से बड़े नेता की छवि के साथ लौटे थे और पटेल के बारे में 1928 में ही टाइम्स ऑफ इंडिया ने बारदोली आंदोलन के नेतृत्व पर लिखकर उन्हें कद्दावर राष्ट्रीय नेता बताया था। अब जैसे नेता की तरह होते तो प्लेग पर दोनों बयान दे देते, अखबार छाप देता, जनता जयकार कर लेती और ये बीमारी नियंत्रित होने पर मास्क वगैरह लगाकर वहां जाते, हाथ हिलाते, सेवा दल वाले झाड़ू-पानी करके ब्लीचिंग पाउडर वगैरह छिड़ककर इन्हें संक्रमित न होने देने का काम निपटाए रहते। ऐसा नहीं है कि आज के नेता गरीबों की गली में नहीं जाते, उनसे मिलकर उनकी मांगों को नहीं उठाते, उन्हें उनके हाल पर जीने-मरने को छोड़ देते हैं, लेकिन तभी जाते हैं, जब चुनाव आते हैं, जब उनके खुद के जीवन-मरण का सवाल होता है, वर्ना लोग जिएं या मरें, अपनी बला से... राजनीति का नया नजरिया है..जन से नहीं सरोकार बस अपनी-अपनी चलती रहे सरकार...खैर इस पर कभी बाद में बात होगी..

लॉकडाउन ही है कोरोना का समाधान -

पीएम-सीएम बैठक में जन से जग तक की भागीदारी की मोदी जी ने अपील की है। मोटे तौर पर ये बात निकल कर आई कि कोरोना की वैक्सीन है नहीं, लॉकडाउन ही समाधान है तो इसे रखना होगा। अब इसे कैसे रखना होगा, ये मुख्यमंत्रियों को तय करना है, जो 15 मई तक रिपोर्ट देंगे। मैंने कल के पोस्ट में कहा भी था कि 15 के आसपास लॉकडाउन-4 की स्थिति साफ होगी। बैठक में ट्रेनों पर विरोधाभास उभरे, केरल जैसे राज्य कोरोना फ्री स्टेट बनने के करीब हैं, उन्होंने 31 मई तक ट्रेन न चलाने को कहा है। ट्रेनों को लेकर अनिर्णय की स्थिति देश के आम विमर्श में भी है। मांग ये हो रही थी कि राशन, राहत, काम न होने से जो मजदूर वापस घर लौटना चाह रहे हैं, जो साधन न होने पर पैदल ही मरते-खपते जा रहे हैं, उन्हें ट्रेनों से जल्दी वापस भेजा जाए।

श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से एक ही दिन में घर पंहुच सकते हैं डेढ़ करोड़ मजदूर-

श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से इतने दिनों में शायद 5 लाख मजदूर ही भेजे जा सके हैं, जबकि भारतीय रेल की क्षमता एक दिन में ही सभी मजदूरों यानी एक-डेढ़ करोड़ तक को भी ले जाने की है। इस बीच अचानक गैर श्रमिक स्पेशल एसी ट्रेनें भी चलाने की खबर आई, जिसकी न मांग थी, न योजना। इस कंफ्यूज़न पर सवाल उठे तो सत्ता समर्थकों ने कहा कि विपक्षी ट्रेन चलाने का भी विरोध करते हैं और न चलाने का भी। जबकि विमर्श ये था कि मजदूरों को कैसे भेजना है?

टिकट को लेकर रजनीतिक दलों की राजनीति-

एक भ्रम की स्थिति मजदूरों के टिकटों को लेकर भी बनी रही, तय ये है कि राज्य 15 फीसदी और केंद्र 85 फीसदी किराया देंगे। रेलवे को टिकट के समय पैसे चाहिए, बिहार ने कहा कि जो आएंगे वो क्वारंटीन में रहेंगे तभी उनका किराया और ऊपर से 500 रुपये मिलेंगे, ऐसे में जहां से इन मजदूरों को जाना था, वहां की सरकार मसलन दिल्ली और राजस्थान सरकार ने 15 फीसदी पैसे देने का दावा किया, जिस पर केजरीवाल की थू-थू हुई। दूसरा कंफ्यूज़न ये हुआ कि ये 15 फीसदी पांच-छह सौ रुपये के रूप में सामने आया जबकि इस हिसाब से जनरल का किराया एसी को भी मात दे रहा था। तीसरा कंफ्यूज़न ये हुआ कि कुछ राज्यों में ये पैसे मजदूरों को ही देने पड़े, क्योंकि बिना पैसे टिकट कट नहीं रहे थे और बिना टिकट दिखाए पैसे मिलते कैसे? इन कंफ्यूज़ंस का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए सोनिया उतरीं कि कांग्रेस किराया देगी, जबकि लिया-दिया कुछ नहीं, लगे हाथ मायावती भी कूद आईं कि यूपी वाले मजदूरों का किराया कोई न दिया तो बीएसपी देगी। कुल मिलाकर भसड़ मच गई जो सोशल मीडिया पर भी दिखा। इसी बीच राजधानी जैसी ट्रेन चलाने की खबर और मजदूरों को भेजने की खबर के विरोधाभास ने सबको उलझा दिया। अब स्थिति ये है कि श्रमिक स्पेशल भी चलेगी, ट्रायल के तौर पर 15 जोड़ी गैर श्रमिक स्पेशल भी चलेगी, लॉकडाउन भी जारी रहेगा, यात्री स्टेशन कैसे जाएंगे? ये उन्हें तय करना है, खुद के साधन हों तो ठीक वर्ना वो जानें कैसे पहुंचना है?

अब उस विषय पर, जिसपर लिखने का एक मित्र ने आग्रह किया है। मीडिया के नजरिये से ये सबसे बिकाऊ और भारत में सबसे पसंदीदा टॉपिक है। तभी तो करोड़ों लोग डेढ़ महीने के लॉकडाउन में कराह उठे हैं, आने वाले वक्त की स्थितियों को लेकर परेशान हैं, बच्चे कैसे पढ़ें, घर कैसे चले, नौकरी जा रही तो खर्च कैसे निकले, ईएमआई कैसे दें, रोजगार कैसे मिले? इन सवालों से जूझ रहे हैं तो मीडिया बिरादरी के लोग ज़मीन जिहाद, पाकिस्तान में कोरोना, कोरोना से इमरान बीमार, साद एक खोज, शाहीन बाग की उलझन सुलझा रहे हैं, तो मित्र का आभार कि इस विषय का अवसर दिया। खबर ये है कि चेन्नई में एक जैन बेकरी ने विज्ञापन में छापा कि सभी ऑर्डर जैन धर्म के लोग बनाते हैं और यहां कोई मुस्लिम स्टाफ काम नहीं करता और पुलिस ने स्वत: संज्ञान लेते हुए बेकरी मालिक को धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। तमिलनाडु में AIADMK की सरकार है, ये पार्टी NDA में बीजेपी की सहयोगी घटक है। गिरफ्तारी कानून-व्यवस्था का मामला है इसलिए सीधे तौर पर राज्य सरकार दोषी है फिर भी बीजेपी मौन है तो इस मौन पर जवाब बीजेपी को भी देना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है, अगर इस आधार पर गिरफ्तारियां होने लगें तो फिर शहर-शहर तमाम होटल्स, ढ़ाबे, फैक्टरियां बंद होने लगेंगे क्योंकि इनके डिस्प्ले बोर्ड पर लिखे नाम भी विज्ञापन ही हैं। इसलिए कानून का सेलेक्टिव इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। अगर कोई ये कहे कि उसके यहां मुस्लिम स्टाफ नहीं है और ये कानून नहीं है कि मुस्लिम स्टाफ रखना अनिवार्य है तो क्या ये गैरकानूनी है?

उपरोक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वो ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी और आजतक आदि संस्थानों में अहम पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

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