अटल सुभद्रा! वीरांगना सुभद्राकुमारी चौहान को भूला देश!

आज वीरांगना सुभद्राकुमारी चौहान का जन्मदिन है। मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी। नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

Updated On: Aug 16, 2020 17:41 IST

Dastak

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शंभूनाथ शुक्ल 

तीन बार प्रधानमंत्री रहे अटल जी को मैंने कुल तीन बार देखा है। पहली बार तब जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था, और पिता जी उनका भाषण सुनने फूलबाग गए थे। मुझे भी ले गए थे। तब केंद्र में लाल बहादुर शास्त्री की सरकार थी। तारीख़ थी, 1965 की 25 दिसम्बर। दोबारा दिल्ली आने पर तब जब इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल ख़त्म हुई थी, और हम लोगों पर तेज़ाब फेंका गया था। वे एक्सप्रेस कर्मचारियों से मिलने बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग आए थे। 1987 की एक दिसम्बर को। तीसरी बार शायद 1999 में जब उन्होंने प्रधानमंत्री आवास से ही पत्रकार हेमंत शर्मा के पिता मनु शर्मा की पुस्तक का विमोचन किया था। तब मैं अपने संपादक प्रभाष जी के साथ गया था। सात, रेसकोर्स रोड स्थित पीएम रेज़ीडेंस के लॉन में शाम 5 बजे प्रोग्राम था। और भव्य जलपान की व्यवस्था थी। वे बड़े नेता थे, अच्छा बोलते थे लेकिन वे मुझे इंदिरा जी की तरह प्रभावित नहीं कर सके। आज उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर उनकी स्मृतियों को नमन।

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आज वीरांगना सुभद्राकुमारी चौहान का जन्मदिन है। उनको देखने का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि उनकी मृत्यु मेरे जन्म के सात वर्ष पूर्व हो चुकी थी। लेकिन उनकी कविताओं ने इतना प्रभावित किया, कि हर समय वे सामने खड़ी होती थीं। उन्होंने झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई को अमर कर दिया। मालूम हो कि अंग्रेज़ी राज में झाँसी की रानी का नाम लेना तक गुनाह था। उन्होंने उन पर लम्बी कविता लिखी। और ताकतवर रियासत ग्वालियर के शासकों के बारे में “अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी” लिख कर महादजी सिंधिया की सारी गौरव गाथाओं पर पानी फेर दिया था। उनकी इस कविता को पढ़ते ही झाँसी की रानी का पूरा शौर्य साक्षात प्रकट हो जाता है। अपने बालपन को अपनी बिटिया के माध्यम से याद करते हुए वे लिखती हैं-

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी। नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी। कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा। मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'। हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया। उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ। मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया। भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

आज सोशल मीडिया पर अटल जी तो छाये रहे, लेकिन लोग इस वीरांगना को भूल गए।

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(ये रचना शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक पोस्ट से ली गई है, उपरोक्त विचार उनके निजी विचार हैं)

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