स्वामी विवेकानंद का भगवा बीजेपी या आरएसएस का भगवा नहीं है

स्वामी विवेकानंद(Swami Vivekananda) के विचारों, आदर्शों और भगवा पहनावे का किसी पार्टी या संगठन से कोई लेना देना नहीं है। किसे कौन ज्यादा पूज रहा है ये देखकर हमें उस व्यक्ति के बारे में निर्णय नहीं लेना चाहिए।

Updated On: Jul 4, 2020 12:29 IST

Dastak

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अजय चौधरी

स्वामी विवेकानंद(Swami Vivekananda) के विचारों, आदर्शों और भगवा पहनावे का किसी पार्टी या संगठन से कोई लेना देना नहीं है। किसे कौन ज्यादा पूज रहा है ये देखकर हमें उस व्यक्ति के बारे में निर्णय नहीं लेना चाहिए। मौजूदा सत्ताधारी पार्टी बीजेपी(BJP) ने स्वामी विवेकानंद को अधिक पूजा, जयंती पर अधिक याद किया ऐसा हम मान लें और स्वामी विवेकानंद की विचारधारा और भाजपा की विचारधारा को एक समझ लें तो गलत हो जाएगा।

ऐसा करने से एक अन्य हानी भी होगी, जिसके परिणामस्वरुप आप अपने आदर्शों से और मुल्यों से दूरी बनाने लगेंगे। क्योंकि वो आदर्श आपको किसी पार्टी या संगठन का एजेंडे में शामिल लगने लगेंगे। समझदार वर्ग के दूरी बनाने से राजनीतिक दल हमारे किसी भी आदर्शवादी व्यक्ति या विवेकानंद को आम जनता के सामने अपने फायदे के अनुसार रखेगी। वो विवेकानंद का वो स्वरुप पेश करेंगे जिससे उन्हें राजनैतिक रुप से फायदा हो सके।

अगर आपको अपने आदर्शों, मुल्यों और महापुरुषों को बचाना है तो आपको उन्हें अपनाना होगा, उन्हें याद करना होगा। उनके विचारों को फैलाना होगा। आपको बताना होगा कि विवेकानंद का भगवा बीजेपी का भगवा नहीं है। ये भी बताना होगा कि विवेकानंद की मृत्यु चार जुलाई 1902 को हो गई थी। आरएसएस की स्थापना केशवराम बलिराम हेडगेवार ने 27 सितंबर, 1925 में की। यानी की स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के करीब 23 साल बाद संघ देश में पहली सांस लेता है।

बीजेपी की बात करें तो सन् 1951 में जनसंघ ने की स्थापना श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की। जिसे बाद में 1980 में भारतीय जनता पार्टी का नाम दिया गया। जबकि विवेकानंद तो 1902 में ही दुनिया को अलविदा कह चुके थे। ऐसे में उनका  बीजेपी या आरएसएस की विचारधारा से कोई नाता कैसे हो सकता है। यहां तक की विवेकानंद का इन संगठनों की स्थापना करने वालों से भी कोई लेना देना नहीं रहा।

विवेकानंद का हिंदुत्व की विचारधारा से भी लेना देना नहीं था, वो बस मानवीय मुल्य पर बात करने वाले व्यक्ति थे। मूर्तीपूजा के खिलाफ थे, दुनिया को जीरो पर घूमाने वालों में से थे। उनका भगवा एक साधु का भगवा था, हिंदुत्व का नहीं। लेकिन जब बीते वर्ष स्वामी विवेकानंद की प्रतीमा दिल्ली के जेएनयू में स्थापित की गई, उसके अनावरण से पहले ही वहां के छात्रों ने उसपर भगवा के खिलाफ स्लोगन लिखे, उसे बीजेपी से जोडा। यहीं ये मार्क्सवादी विचारधारा रखने वाले छात्र गलती कर गए।

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जेएनयू में पिछले वर्ष स्वामी विवेकानंद की प्रतीमा पर भगवा को लेकर स्लोगन लिखे गए थे ( Photo Source- Social Media)

असल में इन्हीं कारणों से एक पार्टी महापुरुषों के अधिक करीब आ रही है और दिल्ली में रहने वाले जेएनयू जैसे संस्थानों के छात्रों को आम लोग भी देशद्रोही समझने लगते हैं। क्योंकि कईं बार उन्हें नहीं पता होता वो एक पार्टी या संगठन के विरोध में स्वामी विवेकानंद का विरोध कर रहे हैं जिनका किसी ऐसे दल से कोई लेना देना होता ही नहीं है। ऐसे में आम लोग इन विरोधों के चलते किसी भी पार्टी की बातों में आसानी से आ जाते हैं और उनका बताया सच ही उन्हें अपना सच लगने लगता है, भले ही असल सच कुछ और हो। जेएनयू के छात्र कभी दिल्ली-एनसीआर के आम लोगों से घुल-मिल नहीं पाए। यही एक बडा कारण है जिसका फायदा दिल्ली को उग्र कर राजनैतिक पार्टियां भी लेती हैं। बात वही है जितना आप अपने महापुरुर्षों से दूरी बनाएंगे वो उतना ही इस्तेमाल करेंगे। और आपको जेएनयू के छात्रों की तरह ये ही नहीं पता हो कि आपको किसका विरोध करना है और किसका नहीं तो फिर आपका कल्याण तय है।

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