आवाम की आवाज बनने वाला यह मीडिया अपनों की ही सिसकियां नहीं समझ सकता क्या?

आज यानी 30 मई को हर जगह हिंदी पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं दी जा रही है। लेकिन कोई ये हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है कि 21 वीं सदी के इस पत्रकारिता के उस विकराल रूप को लिखें। जहां आज के युवाओं के लिए यह क्षेत्र एक बेचैनी का सबब बन गया है।

Updated On: May 30, 2020 19:50 IST

Dastak Web Team

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रितु राज

बेचैनियों की कालिख पर कोई इस कदर दर-ब-दर हो सकता है क्या?

आवाम की आवाज बनने वाला यह मीडिया अपनों की ही सिसकियां नहीं समझ सकता क्या?

आज यानी 30 मई को हर जगह हिंदी पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं दी जा रही है। कोई पत्रकारिता के इतिहास को खंगााल रहा, तो कोई इसकी साख बचाने का सुर अलाप रहा, कोई इसके बदलते शैली की दुहाई दे रहा, तो कोई इसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के तौर पर होने के बावजूद सत्ता की कतपुटली का नाम दे रहा है। लेकिन कोई ये हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है कि 21 वीं सदी के इस पत्रकारिता के उस विकराल रूप को लिखें।

जहां आज के युवाओं के लिए यह क्षेत्र एक बेचैनी का सबब बन गया है। जो कल के भविष्य होंगे, उनकी इस पत्रकारिता के महकमे को ख्याल तक नहीं है। बुद्धिजीवी समाज के लोगों की आवाज़ बनकर चीखने-चिल्लाने वाला यह मीडिया आज अपने की सहयोगीयों का गला घोट रहा है। आज मीडिया में नौकरी नहीं है। कितने मीडिाकर्मियों को दिहाड़ी पर रखते है। कभी सुना था सीनियर का काम अपने जूनियर की पीठ थपथपाने का होता होता है, पर पत्रकारिता में उसकी जगह टांग खींचने की हो गई है। जहां बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि मीडिया खुद में एक कालिख है, तुम इसका हिस्सा मत बनो। 

इन सबसे हटके जो एक बेहद अजीब बात है। वो यह है कि मीडिया जो खास करके लड़कियों के साथ समाज में हो रहे बर्बरता पर मुखर रहता है लेकिन मैं उस आवाज़ की दुहाई देती हूं। जो अपने ही संस्थान की लड़कियों के साथ अन्याय करते हैं। मीडिया में लड़कियां अगर अपने आप को समर्पित कर दे, तो नौकरियों की किल्लत कभी नहीं होगी, अगर बगावत कर दे तो ताउम्र बेरोजगार रहेंगी। ये आज के मीडिया की भानायक  तस्वीर है। मीडिया में इंटरव्यू से पहले भी एक इंटरव्यू देना पड़ता है। जिसमें उस लड़की के दिमाग को भापा जाता है। ये लड़की सबकुछ करने को राजी होगी या नहीं। इसके दो पक्ष है अगर आज मीडिया की स्थिति यह है तो जाहिर है कि यह रातों-रात नहीं बनी होगी। यह पता नहीं मीडिया में लड़कियां ने अपनी मेहनत का क्या परिचय दिया है। पुरुषों ने उस मेहनत को क्या समझा लेकिन आजकल की लड़कियों को ऐसी हालातों से गुजरना पड़ता है।

बड़े मीडिया चैनल की कहानी और भी निराली है। उन्होंने खुद के दुकान खोल लिए हैं तो वहां वैकेंसी की गुंजाईश ना के बराबर होती हैं। अगर कोई न्यू कमर रिज्यूमें भेजते तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कहा जाता है मीडिया में भाई सबकुछ जुगाड़ से होता है। लानत है देश की इस चौथे स्तम्भ की सोच के इस विकृत मानसिकता पर और उन क्रांतिकारी पत्रकारों पर जो अपने ही घर के पाप को ढ़कते हैं और देश के घर के लिए आवाज बनने का नाटक करते हैं। 

जरूरत है एक बार फिर से पत्रकारिता के उस व्हाइट कॉलर को वापस लाने की। जहां चैन से, सुकून से लोग काम कर सके। तभी शोभा होगी लोग हिंदी पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं दें वरना सब बेईमानी होगी। ना जानें इसके तह में कितने नए बच्चों के दर्द दफनाए होंगे और यकीन मानिए युवाओं का यह दर्द जिस दिन संगठित होकर आवाज का रूप लेगा उस दिन इस महकमें लोग नजरें छुपाते फिरेंगे।

 

 

 

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