चौधरी अजित सिंह के जाने के बाद किस करवट बैठेगी पश्चिमी उत्तरप्रदेश की राजनीति!

2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश का माहौल बिगाडा था जिसका खामियाजा चौधरी अजित सिंह की पार्टी को भुगतना पड़ा था। लेकिन किसान आंदोलन ने फिर से समीकरणों में बदलाव किया। अब चौधरी अजित सिंह के चले जाने से एक बार फिर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में राजनीति करवट ले रही है।

Updated On: May 6, 2021 14:47 IST

Ajay Chaudhary

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अजय चौधरी

किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे चौधरी अजित सिंह अब नहीं रहे। आगे कि विरासत अब उनके बेटे और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के कंधों पर है। चौधरी चरण सिंह के दबदबे और मजबूत किसान राजनीति के चलते चौधरी अजित सिंह को कभी चुनाव न हारने वाला नेता कहा जाता था। वो उत्तरप्रदेश की बागपात लोकसभा सीट से 2014 तक कभी नहीं हारे, वे सात बार सांसद और केंद्र की कईं सरकारों में मंत्री भी रहे।

2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने बिगाडा था चौधरी अजित सिंह का समीकरण-

जाटों का गढ़ कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तरप्रदेश 2013 में दंगों की भेंट चढ़ गया। जिसका फायदा तत्कालीन उत्तरप्रदेश की सपा सरकार ने लेना चाहा। सपा को लग रहा था कि दंगों के माहौल से मुस्लिम वोट बैंक उनकी तरफ खिसक जाएगा लेकिन दंगे इतना विकराल रुप धारण कर लेंगे और सेना तक को उत्तरप्रदेश में उतारना पड़ेगा ऐसा सपा ने नहीं सोचा था। दंगे बड़े होने का असल फायदा मिला भारतीय जनता पार्टी को। 2014 लोकसभा चुनाव उत्तरप्रदेश की कुल 80 सीटों में से 71 भाजपा की झोली में आई। न सिर्फ उत्तरप्रदेश मुजफ्फरनगर दंगों का असर देशभर में हिंदू वोट बैंक पर पड़ा और वो भाजपा की तरफ खिसकी और पहली बार ऐसा हुआ कि पश्चिमी उत्तरप्रदेश में चौधरी अजित सिंह और उनकी पार्टी बुरी तरह हार गई। 2017 यूपी विधानसभा चुनाव और 2019 लोकसभा चुनाव में भी राष्ट्रीय लोकदल की हार का ये सिलसिला जारी रहा।

पश्चिमी उत्तरप्रदेश में जाट और मुस्लमानों का भाईचारा बिगड़ने का खामियाजा भुगता चौधरी अजित सिंह ने-

पश्चिमी उत्तरप्रदेश में जाट समुदाय और मुस्लिमों का आपसी भाईचारा ही चौधरी अजित सिंह की लंबे समय से ताकत बना हुआ था। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में इन दोनों समुदायों का आपसी भाईचारा खिन्न-भिन्न हो गया। जाट हिंदू हो गए और मुस्लमान अब भाई नहीं सिर्फ कट्टर मुस्लिम साबित हो गए। चौधरी अजित सिंह उस समय केंद्र की मनमोहन सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री बने चुप्पी साधे रहे, वो ये समीकरण नहीं बिगड़ने देना चाहते थे। लेकिन उनकी चुप्पी से उनके जाट वोट बैंक में काफी नाराजगी देखी गई। जाटों की नाराजगी थी कि हम दंगों में जीते मरते रहे लेकिन हमारा नेता हमें देखने भी नहीं आया। मुस्लिमों का वोट अन्य पार्टियों में बंट गया और अजित सिंह के जाट मोदी लहर में हिंदू हो लिए। दंगों के बाद जाटों को लग रहा था कि मुस्लमान उनपर हावी हो रहे हैं और भाजपा ही एक पार्टी है जो उन्हें इनसे मुक्ति दिला सकती है। क्योंकि सपा और बसपा जैसी पार्टियों ने मुस्लिम वोट बैंक हासिल करने के लिए बहुत सी राजनैतिक गलतियां की हुई थी।

जाट-मुस्लमानों का कैसे समीकरण बैठाते थे अजित सिंह-

चौधरी अजित सिंह की 2014 में हार की वजह सिर्फ मुजफ्फरनगर दंगे ही नहीं लंबे समय से चली आ रही पश्चिमी उत्तरप्रदेश की बदहाली भी थी। क्योंकि प्रदेश के इस हिस्से पर राष्ट्रीय लोकदल का दबदबा रहा इसलिए अजित सिंह का इलाका समझ किसी अन्य पार्टी की सरकार ने कभी पश्चिमी उत्तप्रदेश के विकास पर खासा ध्यान नहीं दिया। इलाके की मुख्य सड़क दिल्ली-सहारनपुर राष्ट्रीय राजमार्ग की बदहाली से भी इलाके के युवा अजित सिंह से नाराज रहने लगे थे। लेकिन बुजुर्ग अभी तक उन्हीं के साथ बने हुए थे। अजित सिंह इन सभी समस्याओं को दरकिनार करते हुए लगातार चुनाव जीत ही जाते थे उसका सबसे बडा कारण उनका जाट-मुस्लिम समीकरण ही था। वे अपनी पार्टी की टिकट अधिकतर जाट या फिर मुस्लिम नेता को ही देते थे। मुस्लिम नेता को टिकट मिलने से मुस्लमान तो उसको वोट करते ही थे और अजित सिंह की पार्टी से होने की वजह से जाट वोट बैंक भी उसी नेता के खाते में जाता था। जिससे अन्य पार्टियां बाकि जातियों की वोट पाकर भी पश्चिमी उत्तरप्रदेश में चौधरी सहाब को हरा नहीं पाती थी।

किसान आंदोलन ने बदले समीकरण-

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहा किसान आंदोलन पश्चिमी उत्तरप्रदेश की राजनीति में नए बदलाव लेकर आया। आंदोलन ने पहले पंजाब वाया हरियाणा होते हुए फिर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में जोर पकड़ा। इन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान भाजपा सरकार से नाराज होने लगे। क्षेत्र से भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता और किसान मसीहा महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र राकेश टिकैत दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलन में बैठ गए। जब सरकार ने जबरदस्ती बॉर्डर से किसानों को खदेड़ना चाहा, उनकी बिजली काटी और पानी रोक दिया गया तब राकेश टिकैत के आंसूओ ने पश्चिमी उत्तरप्रदेश में उबाल ला दिया। क्षेत्र में कई महापंचायतें हुई। उनमें चौधरी अजित सिंह और जयंत चौधरी की अहम भूमिका रही। जनसैलाब ने बताया कि एक बार फिर राष्ट्रीय लोकदल की पकड़ इलाके में मजबूत हो रही है। टिकैत ने भी माना कि चौधरी सहाब को हराना उनकी सबसे बड़ी भूल थी।

सपा और रालोद का गठजोड़ बन रहा है क्षेत्र का नया समीकरण-

समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) का नया समीकरण बनता दिख रहा है। जयंत चौधरी इलाके में फिर से किसानों के बीच छाए हुए हैं। वो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी सीधा हमला अपने भाषणों में बोल रहे हैं। वहीं भाजपा के नेताओं ने अपनी गाड़ियों से पार्टी की झंडी उतार ली है। क्योकिं किसानों ने उनके गांव में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया है। भाजपा ने जिस हिंदू-मुस्लिम एंगल का सहारा लिया था उसे किसान आंदोलन ने काफी बौना साबित कर दिया है। अब जाट और मुस्लिम समाज सहित काफी अन्य जातियां किसान बन गयी हैं क्योंकि उनका मुख्य व्यवसाय खेती ही है। जिसका फायदा जयंत को मिल रहा है। अब चौधरी अजित सिंह के गुजर जाने की इलाके की सहानुभूति भी जयंत के साथ है। जिसका निश्चित तौर पर जयंत को लाभ मिलेगा। इलाके के किसानों का मानना है कि उन्होंने भले ही भाजपा को विकास और अन्य मुद्दों पर वोट दी है लेकिन उनके अपने तो चौधरी अजित सिंह ही हैं।

अखिलेश यादव होंगे मुख्यमंत्री पद के दावेदार, जयंत संभलेंगे पश्चिमी उत्तरप्रदेश की कमान-

अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच दूरियां कम हो रही हैं। किसान महापंचायतों में दोनों पार्टियों की भागीदारी ने भी इसपर मोहर लगाई है। 2022 में यूपी विधानसभा चुनाव होना है। जिसमें अब बहुत कम समय बाकी है। दोनों ही पार्टियां चुनाव में गठजोड़ कर सकती हैं इस बात की प्रबल संभावना है। हालांकि अभी ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई है। अखिलेश उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के दावेदार होंगे और वो पश्चिमी उत्तरप्रदेश की सीटें राष्ट्रीय लोकदल को चुनाव लड़ने के लिए सौंप देंगे, ये पूरी संभावना बनी हुई है। मायावती का रुख अभी साफ नहीं है लेकिन मायावती के किसी भी करवट बैठने से इन दोनों पार्टियों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये आराम से मौजूदा हालातों को देखते हुए अपनी सीटें निकाल सकते हैं। उत्तरप्रदेश और खासकर पश्चिमी क्षेत्र में कांग्रेस अभी किसी भी भूमिका में नजर नहीं आ रही इसलिए उसका जिक्र करना भी अभी उचित नहीं है।

बंगाल में टीएमसी की जीत से विपक्षी दलों को मिला है बल-

बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी की जीत से भाजपा के विपक्षी दलों के हौंसले बढ़े हैं। ममता भी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश की पैरवी करती दिख सकती हैं। ममता ने चुनाव जीतने के बाद कहा है कि ये मेरी नहीं देश की जीत हुई है, लोकतंत्र की जीत हुई है। देश मे फिलहाल किसानों की और कोरोना काल मे सरकार की लापरवाही को लेकर भाजपा के खिलाफ माहौल है। अगर ये माहौल ऐसे ही कायम रहा तो इस विधानसभा चुनाव में अखिलेश उत्तरप्रदेश के एक बार फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं। अगर हालात थोड़े बहुत बीजेपी के पक्ष में जाते हैं तो अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के चांस 50-50 हो जाते हैं। अगर अखिलेश अच्छे मतों से सरकार में आते हैं तो जयंत चौधरी को यूपी कैबिनेट में महत्वपूर्ण मंत्रीपद मिल सकता है। अगर इस बार ये दल कामयाब नहीं होता तो भी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में अखिलेश ही यूपी के मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार होंगे। क्योंकि अभी उनके अलावा कोई मजबूत चेहरा यूपी में दिखाई नहीं दे रहा। अगर 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा अच्छा प्रदर्शन करती है तो राहुल गांधी सहित अखिलेश यादव और ममता बेनर्जी विपक्ष की तरफ से प्रधानमंत्री पद का दावेदारी ठोक सकते हैं।

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(लेखक दस्तक इंडिया के एडिटर हैं)

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