जब परिवार का बड़ा सदस्य पक्षपाती हो जाए, तब जन्म लेता है विद्रोह- अजय चौधरी

यूपी में हालिया हुए जिला पंचायत चुनाव बतलाते हैं कि जीत के लिए पार्टी फंड का बडा होना कितना महत्वपूर्ण है, फर्क चहरों और काम से नहीं पड़ता, कुनबा अपका कितना बडा और रईस है उससे फर्क पड़ता है।

Updated On: Jul 6, 2021 13:12 IST

Ajay Chaudhary

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Source- pixabay Edited by Dastak India)

देश और घर की बात तब बिगड़ती है जब परिवार का बड़ा और जिम्मेदार व्यक्ति पक्षपाती हो जाता है। तब परिवार के सदस्य उसे मन से उसे अपना प्रतिनिधी स्वीकारना बंद कर देते हैं और विद्रोह का जन्म होता है।

परिवार का पक्षपाती प्रतिनिधी अब उसे कुचलने के लिए हर हथकंडे अपना रहा है। अब परिवार की लड़ाई में धर्म के बाद जातियों को डाला जा चुका है। मनोवैज्ञानिक युद्ध जारी है। किसान आंदोलन को चंद जातीय समूहों और क्षेत्र का घोषित किया जा रहा है।

इस कार्य में मनोवैज्ञानिक रुप से पेड मीडिया अहम भूमिका में है। यूपी विधानसभा चुनाव के मुहाने पर तिजोरी की चाबी और गद्दी के दम पर विरोधी स्वरों को पस्त किया जाना शुरु हो चुका है। जल्द ही परिवार के हल्के सदस्य दल-बदल की स्थिती में भी आएंगे।

सत्ता मनोवैज्ञानिक रुप से हर पहलू पर काम कर रही है, जिसका जवाब देने के लिए विपक्षी दलों के पास एक अच्छा मंच भी नहीं है। अगर मंच अच्छा है भी तो उसकी पहुंच हर व्यक्ति तक नहीं है। देश का सूचना तंत्र और मीडिया इस समय केवल गुणगान की स्थिती में है। उनका आर्थिक पहलु अब उन्हें इससे अधिक कुछ करने की इजाजत भी नहीं दे सकता।

अब घर का बड़ा कुनबे में अपने तरफदारों को हर तरह से अपनी गद्दी बचाए रखने का आदेश जारी कर चुका है, अपने तरफदारों को हर तरह से पोषित करने में भी जुटा है। सोशल मीडिया के हथियारों और भारी-भरकम तकनीक और टीम के दम पर चुनावी नतीजों में बदलाव की ताकत अब घर का बडा रखने लगा है।

यूपी में हालिया हुए जिला पंचायत चुनाव बतलाते हैं कि जीत के लिए पार्टी फंड का बडा होना कितना महत्वपूर्ण है, फर्क चहरों और काम से नहीं पड़ता, कुनबा अपका कितना बडा और रईस है उससे फर्क पड़ता है। वैसे भी जिला पंचायत एक बिकाऊ चुनाव हमेशा से रहा है।

सदस्य बनने के लिए लोग 1 से 10 लाख खर्चते हैं और फिर करोड़ों में बिकते हैं। क्योंकि जिला अध्यक्ष सीधे जनता नहीं जनता द्वारा चुने गए जिला पंचायत सदस्य चुनते हैं, जनता का रोल खत्म होने के बाद लोकतंत्र की हत्या का असल खेल शुरु होता है।

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हम क्या करें, हमारी न्यायिक व्यवस्था भी परिवार के बडे सदस्य के खिलाफ पद पर रहते हुए जांच नहीं कर सकती, सजा नहीं सुना सकती। अन्य सदस्य जो विरोधी नेतृत्व कर रहे हैं सत्ता सुख भोगने के लिए तत्पर हैं, उम्मीद बदलाव की उनसे भी हम कैसे लगा सकते हैं।

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(लेखक अजय चौधरी दस्तक इंडिया के एडिटर हैं)

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