संघवादी देश में पूरे देश की शिक्षा प्रणाली को चलाने के लिए केवल एक अथॉरिटी क्यों?

भारत का मूल ढांचा संघवादी है। इसका मतलब है कि हमारे देश में शक्तियों और अधिकारों का बंटवारा किया गया है ताकि केंद्र और राज्य के बीच कोई विवाद पैदा न हो और कोई भी सरकार शक्तियों का केंद्र न बन सकें और अपनी मनमानी न चला सकें।

Updated On: Jul 31, 2020 15:32 IST

Dastak Online

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हिना

भारत का मूल ढांचा संघवादी है। इसका मतलब है कि हमारे देश में शक्तियों और अधिकारों का बंटवारा किया गया है ताकि केंद्र और राज्य के बीच कोई विवाद पैदा न हो और कोई भी सरकार शक्तियों का केंद्र न बन सकें और अपनी मनमानी न चला सकें।

हमारे देश में सीमाओं को काफी महत्व दिया जाता है। कहते हैं कि सभी को अपनी मर्यादा में रहकर काम करना चाहिए। किसी और के कामों में टांग अड़ाना समझदारी नहीं है। इसलिए इस देश में सभी की मर्यादा तय की गई है। चाहें वो सरकार हो, राज्य सरकार हो या कोई प्रशासनिक संस्थान।

लेकिन जब आज से दो दिन पहले इस देश में एक नई शिक्षा नीति को लागू किया गया तब उसमें कुछ मर्यादाओं का उल्लंघन किया गया, इसके बारे में हम आगे बताएंगे। उससे पहले नई शिक्षा नीति कुछ बड़े बदलावों पर नजर डाल लेते हैं जिसमें कुछ बदलावों को सकारात्मक तरीके से देखा जा रहा है लेकिन इस पर काफी सवाल भी उठ रहे हैं।

नई शिक्षा नीति में क्या-क्या हुए बड़े बदलाव-

पहला बदलाव- सबसे बड़ा बदलाव स्कूल के ढांचे में किया गया है। पुरानी शिक्षा व्यवसथा में स्कूली शिक्षा 10+2 के ढांचे पर चलती थी। अब इसे बदलकर 5+3+3+4  के ढांचे में बदल दिया गया है।

दूसरा बदलाव- पांचवी तक हिंदी, क्षेत्रीय व मातृभाषा के माध्यम से पढ़ाई अनिवार्य।

तीसरा बदलाव- छठी कक्षा से बच्चों को अकादमिक शिक्षा के साथ प्रोफेशनल स्किल्स का ज्ञान भी दिया जाएगा।

चौथा बदलाव- स्ट्रीम सिस्टम को खत्म कर दिया गया है।

पांचवा बदलाव- बोर्ड परीक्षाओं में छात्र का सम्पूर्ण आकलन किया जाएगा।

छठा बदलाव- उच्च शिक्षा में मल्टी-एंट्री और मल्टी एग्जिट को मान्यता दी गई है।

सांतवा बदलाव- सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के लिेए एक कॉमन एट्रेंस टेस्ट ऑफर किया जाएगा।

आंठवा बदलाव- सभी विदेशी यूनिवर्सिटी भारत में अपना कैंपस बना पाएंगी।

नौंवा बदलाव- पी.एच.डी करने के लिए एम.फिल आवश्यक नहीं होगा।

दसवां बदलाव- परीक्षा के पैर्टन में बदलाव।

कौन-से बदलाव शिक्षा में बड़ी सकारात्मक भूमिका निभायेंगे-

अगर सकारात्मक नजरिए से देखा जाए तो कई सकारात्मक बदलाव सरकार ने नई शिक्षा नीति में किए गए हैं। ऐसे बदलाव जो कई वर्ष पहले हो जाने चाहिए थे। सबसे पहले तो छोटी क्लास में पढ़ने वाले बच्चों के लिए किताबों का बोझ कम कर दिया गया है। इसके बदले बच्चों को खेल और विभिन्न एक्टिविटी के द्वारा पढ़ाया जाएगा।

स्ट्रीम सिस्टम के खत्म होने से भारतीय शिक्षा व्यवस्था में हैरारिकी खत्म हो जाएगी। पहले बच्चों की स्ट्रीम के आधार पर उन पर अपने आप एक हैरारिकी लागू हो जाती थी। जिसमें सांइस स्ट्रीम के छात्र  सुपीरियर कॉमर्स के उनसे कम सुपीरियर और आर्टस वाले छात्रों को सबसे निचले दर्जे का माना जाता था। इसी हैरारिकी के कारण बच्चों पर अभिभावक सांइस या कॉमर्स लेने का दबाव बनाते थे। यदि कोई बच्चा अपनी इच्छा से आर्टस लेता था तो उसे कम दिमाग और कम पढ़ने वाला माना जाता था। लेकिन अब अगर बच्चा चाहे तो केमेस्ट्री के साथ इतिहास पढ़े या फैशन डिजाइनिंग उस पर कोई हैरारिकी लागू नही हो पायेगी और बच्चा दबाव मुक्त हो कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे पाएगें।

वोकेशनल ट्रेनिंग से बच्चों में रोजगार संबधी जागरूकता और स्किल्स पैदा होंगी और कोडिंग के जरिए बच्चों की एनालिसिस औऱ गणितिय समझ बढ़ेगी। इसके आलावा बोर्ड परीक्षाओं के आकलन के आधार को भी पूरी तरह बदल दिया गया है। पहले केवल वर्षिक परीक्षाओं के आधार पर उसके ऱिपोर्ट कार्ड का आकलन किया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होगा अब बच्चे का आकलन उसकी करीकुलर एक्टीविटी के साथ, एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी उसका व्यवहार और उसकी काबिलियत के आधार पर किया जाएगा।

क्या है उच्च शिक्षा के सकारात्मक बदलाव-

उच्च शिक्षा में कई छात्र ऐसे होते हैं जिन्हें बड़े संघर्ष के बाद यहां आने का मौका मिल पाता है और उसके बाद भी कुछ ऐसे कारण होते हैं जिनके वजह से उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। इसलिए तब उनके एक साल या दो साल पढ़ाई करने के बाद भी वह शून्य रह जाते हैं मतलब केवल 12 वीं पास उनके पास कोई ऐसा प्रमाण पत्र नहीं होता जिसे वह भविष्य में किसी औपचारिक जगह दिखाकर लाभ पा सकें। लेकिन नई शिक्षा प्रणाली आने के बाद यदि को छात्र एक साल ग्रेजुयेशन करके पढ़ाई छोड़ देता है तो उसे सर्टिफिकेट दिया जाएगा और यदि छात्र दो साल अपनी पढ़ाई पूरी करता है तो उसे डिप्लोमा दिया जाएगा। तीन साल के बाद उसे डिग्री दी जाएगी। इस व्यवस्था को ही मल्टी-एंट्री और मल्टी-एग्जिट सिस्टम कहा गया है।

इस बदलाव के आलावा, उच्च शिक्षा में प्रवेश लेते समय अगर किसी छात्र के मार्क्स कम रह गए हैं तो सरकार उन्हें कॉमन ऐंट्रस टेस्ट ऑफर करेगी। जिसे मार्क्स को छात्र के 12वीं के मार्क्स में जोड़ा जाएगा। जिससे छात्र को आसानी से उच्च शिक्षा में प्रवेश ले पाएगा। यहां इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिेए कि मैरिट लिस्ट का सिस्टम भी कायम रहेगा।

नई शिक्षा नीति पर उठ रहें हैं सवाल-

जब से शिक्षा नीति के बदलावों की घोषणा हुई है। तब से इस पर कुछ सवाल भी खड़े हो रहे हैं पहला तो यह कि इस नीति में पांचवी तक की शिक्षा हिंदी क्षेत्रीय या मातृभाषा में कराने की बात कही जा रही है लेकिन हमारा देश बहुभाषी और कई राज्यों के लोग दूसरे राज्यों में जाकर रहते हैं जहां उनकी मातृभाषा अलग होती है और राज्य की क्षेत्रीय भाषा अलग अब बच्चा किस भाषा में पढ़ पाएगा। इसी से जुड़ी एक और समस्या है भारत में कई ऐसे इलाके हैं जहां एक ही टीचर सारे विषय पढ़ाता है और कई बार उस टीचर की बहाली अलग राज्यों से की जाती हैं ऐसे में जब टीचर उस गांव की भाषा या मातृभाषा को नहीं जानेगा तो बच्चों को उस भाषा में कैसे पढ़ाएगा।

दूसरा सवाल यहां यह उठ रहा कि सरकार का कहना है कि वह शिक्षा के क्षेत्र में वह कुल जी.डी.पी का 6 प्रतिशत खर्च करने वाली है जब सरकार बार-बार यह करती है कि उसके पास पैसे की कमी है तो यह संभव कैसे होगा इस बात की कोई चर्चा नहीं है।

एक और सवाल इस नीति को लेकर सरकार की नियत पर उठ रहा है कि संघवादी देश में उसने सम्पर्ण भारतीय शिक्षा प्रणाली को संचालित करने और उस पर निर्णय लेने के लिए अलग-अलग हायर अथॉरिटी को खत्म करके एक अथॉरिटी क्यों बनाई।

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संविधान द्वारा तय मर्यादाओं का किया गया उल्लघंन-

सरकार ने इस शिक्षा नीति को बनाने के लिए न तो सदन में बिल पेश किया न ही बहस की न ही भरपूर मात्रा में सुझाव लिए गए। लोकतांत्रिक देश में किसी कानून को बनाने से पहले दोनों सदनों बिल पेश किया जाता है उसके सभी पहलुओं पर चर्चाएं होती हैं। लेकिन सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। सरकार ने पूरी प्रणाली के तहत काम करने की बजाए दूसरा ही रास्ता अपनाया गया जिसमें केवल केबिेनेट ने मिलकर इस शिक्षा नीति को मंजूरी दे दी।

भारत अपने विकेंद्रकरण के लिए जाना जाता हैं यहां कोई भी सर्वशक्तिमान नहीं हैं हर किसी के ऊपर किसी न किसी का अंकुश है। सरकारों की बात करें तो 1976 में शिक्षा को राज्य की अधिकार सूची में शामिल किया गया था। अलग-अलग संस्थाएं अपने स्तर पर शिक्षा का संचालन करती थी। लेकिन अब सभी को खत्म कर के केवल एक संस्था बनाई जाएगी। जिससे सम्पर्ण शिक्षा केन्द्र के हाथों में सिमट जाएगी। वैसे सत्तारूढ़ पार्टी का केंद्रकरण करने पर अधिक जोर रहा है। ऐसे ही कारणों से सरकार की मंशा पर बार-बार सवाल खड़े होते रहें हैं। हर बार संविधान के संघवाद जैसे मूल्यों हानि पहुंचाई गई है और मर्यादाओं का उल्लंघन किया गया है।

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