हर बात पर कैसे आहत होती है भावना?

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संजय बिष्ट

(लेखक इंडिया टीवी में वरिष्ठ पत्रकार हैं)

फोटो- संजय बिष्ट

किसी की भावनाएं फिल्म से आहत हो रही है तो किसी की आस्था को एक गाने से ठेस पहुंचती है।किसी की भावना का दमन लाउडस्पीकर से हो रहा है तो कोई किसी भाषण से भावना को चोट पहुंचने का राग अलाप रहा है। हालत ये हो गई है कि खाने-पीने से भी भावनाएं आहत होने लगी हैं। भावनाओं के आहत होने का ये स्वर्णकाल है। दौर कुछ ऐसा चल चुका है कि बात बात में लोगों की भावनाएं आहत हो रही हैं। ऑफिस से थका मांदा घर की तरफ लौट रहा था तो सोचा आधा किलो मटन ले लूं।

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 मटन की थैली हाथ में पकड़कर मैं दरवाजे पर खड़ा था। पत्नी ने छूटते ही पहला सवाल दागा कि ‘हाथ में क्या है?’  एक पल को मैं भी उस मासूम बकरी की तरह मिमियाने लगा। अपराधी की तरह मैं बोला, ‘मटन’। ऐसा बोलते ही मेरी पत्नी ने असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया। वो प्रदर्शन करने लगी। शोरगुल मचाने लगी। आत्मदाह की धमकी देने लगी। मैंने इसका कारण पूछा तो उसने सिर्फ इतना कहा, ‘मैं वेजीटेरियन हूं, मटन लाकर, तुमने मेरी भावना आहत कर दी हैं।’ पत्नी अपना आंदोलन मोहल्लाव्यापी बनाती उससे पहले ही मैंने प्रायश्चित कर लिया। दिल और जुबान पर पत्थर रखकर गली के कालू कुत्ते को मैंने मटन की सप्रेम भेंट दे दी। बदले में कालू कुत्ते ने रात के समय मेरी टांगों को नोंचने का प्लान एक हफ्ते तक कैंसल कर दिया।

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तब से लेकर अब तक मेरे दायरे में हर किसी की भावना आहत हो रही है और उसका जिम्मेदार मुझे ठहराया जा रहा है। बच्चों को समय से घुमाने नहीं ले जा सका, इसलिए उन्होंने भावना आहत होने की जोरदार शिकायत की। दोस्त के लिए शराब की बोतल नहीं ले जा सका तो उसने भावना को ठेस पहुंचाने का आरोप मढ़ा। सहकर्मी को पैसों की सहायता नहीं दे सका तो उसने भी भावना आहत होने का बम मेरे सिर पर ही फोड़ा। दूध वाले से दूध में पानी मिलाने की शिकायत की तो उसने भावना आहत करने के लिए मुझे जमकर लताड़ा।

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जैसे भावना पर चोट पहुंचाने वाले नहीं रूक रहे हैं। वैसे ही चोट खाने वाले भी नहीं रूक रहे हैं बल्कि भावना पर चोट पहुंचाने के बाद दर्द से तिलमिलाने वाले ज्यादा हैं। पता नहीं ये तिलमिलाने वाले अचानक कहां से आ जाते हैं? पता नहीं पूरे साल ये लोग कहां पड़े रहते हैं? ये लोग शायद भावना पर ठेस पहुंचने का इंतजार करते होंगे। इस इंतजार में रहते होंगे कि आखिर कैसे इनकी भावना को ठेस पहुंचे? इसके लिए ये शायद महाधिवेशन भी करते होंगे। प्रखर वक्ताओं को बुलाते भी होंगे। ऐसा ही चलता रहा तो ये भी हो सकता है कि भावना आहत होने के तरीके सीखाने की कोई यूनिवर्सिटी भी खुल जाए। अब जरा सोचिए इस यूनिवर्सिटी का प्रिंसिपल कौन होगा और यहां का टीचर कौन होगा?

 

“ये लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में सभी सूचनाएं लेखक द्वारा दी गई हैं, जिन्हें ज्यों की त्यों प्रस्तुत किया गया हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति दस्तक इंडिया उत्तरदायी नहीं है।”

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