Konark Sun Temple: ओडिशा में स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर भारतीय संस्कृति और वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने हाल ही में इस मंदिर की यात्रा की और इसे “भारतीय संस्कृति और रचनात्मकता का सच्चा चमत्कार” कहा। 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित यह मंदिर सूर्य देव को समर्पित है। मंदिर को एक विशाल रथ के रूप में डिजाइन किया गया है, जिसमें 24 जटिल रूप से नक्काशी किए गए पहिए और सात पत्थर के घोड़े हैं।
पुरातन ज्ञान का प्रतीक(Konark Sun Temple)-

मंदिर की प्रत्येक नक्काशी में गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अर्थ छिपा है। प्रत्येक पहिया लगभग 12 फीट व्यास का है और इसमें आठ तीलियां हैं जो दिन के आठ अंतराल का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये पहिए वास्तव में सूर्य घड़ियां के रूप में कार्य करते हैं।
एक किंवदंती(Konark Sun Temple)-
मंदिर के बारे में सबसे रोमांचक किंवदंती एक विशाल चुंबकीय पत्थर से संबंधित है जो कथित तौर पर मंदिर के शिखर पर था। कहा जाता है कि यह चुंबकीय पत्थर आस-पास के समुद्री जहाजों के कम्पास को प्रभावित करता था।

बलिदान का प्रतीक-
मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध कहानी 12 वर्षीय धर्मपाद के बलिदान की है। किंवदंती के अनुसार, जब मंदिर के शिखर पर अंतिम पत्थर रखने में कठिनाई हुई, तो धर्मपाद ने अपने पिता की प्रतिष्ठा बचाने के लिए नदी में कूद कर अपना बलिदान दे दिया।
सांबा का पौराणिक संदर्भ-
एक अन्य पौराणिक कथा श्रीकृष्ण के पुत्र सांबा से जुड़ी है, जिन्हें कहा जाता है कि उन्होंने एक सूर्य मंदिर का निर्माण किया था और सूर्य देव से अपने कोढ़ का इलाज करवाया था।

संरक्षण और वर्तमान महत्व-
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) मंदिर के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आज यह मंदिर न केवल एक ऐतिहासिक स्थल है, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है।
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एक जीवंत विरासत-
कोणार्क सूर्य मंदिर केवल एक पुरातात्विक स्मारक नहीं है, बल्कि भारतीय वास्तुकला, विज्ञान और आध्यात्मिकता का एक जीवंत उदाहरण है। हर साल कोणार्क नृत्य महोत्सव इस ऐतिहासिक स्थल को और भी अधिक जीवंत बनाता है।
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