Donkey Worship Tradition: राजस्थान के भरतपुर जिले में शीतला माता की पूजा अद्भुत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई गई। होली त्योहार के कुछ दिन बाद मनाया जाने वाला यह त्योहार, जिसे ‘बासौदा’ के नाम से जाना जाता है, स्थानीय लोगों द्वारा बड़े ही धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया।
Donkey Worship Tradition शीतला माता की पूजा का महत्व-
शीतला माता की पूजा सामान्यतः चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को की जाती है, हालांकि कई क्षेत्रों में यह पूजा होली के पश्चात आने वाले पहले सोमवार या गुरुवार को भी संपन्न होती है। शीतला माता को सभी प्रकार के पापों का नाश करने वाली और भक्तों के तन-मन को शांति देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। इस पावन अवसर को विभिन्न नामों से भी जाना जाता है, जिनमें बूढ़ा बसौड़ा, बसौड़ा, बासौड़ा, लसौड़ा या बसियौरा शामिल हैं। यह पर्व मुख्य रूप से वसंत और ग्रीष्म ऋतु में मनाया जाता है, विशेष रूप से चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को। इसी कारण से इस दिन को “शीतलाष्टमी” के नाम से भी संबोधित किया जाता है।
Donkey Worship Tradition अनोखी परंपरा, गधे की पूजा-
भरतपुर के शीतला माता मंदिर में एक विशेष परंपरा देखने को मिलती है – गधे की पूजा। शीतला माता के भक्त गधे को देवी की सवारी मानते हैं और इसलिए इस दिन गधे की भी पूजा की जाती है। यह अनोखी प्रथा भरतपुर क्षेत्र की एक विशिष्ट पहचान बन गई है। पूजा करने आईं पुष्पा गुप्ता ने इस परंपरा के बारे में बताते हुए कहा, “पूजा करने से परिवार के बच्चे स्वस्थ रहते हैं। चेचक या टाइफाइड जैसी बीमारियां नहीं होती हैं। यह पुरानी परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। गधे को शीतला माता की सवारी माना जाता है, इसलिए आज के दिन हम गधे की भी पूजा करते हैं।”
Donkey Worship Tradition बिना चूल्हा जलाए त्योहार की अनूठी परंपरा-
शीतला माता की पूजा के दिन एक महत्वपूर्ण नियम यह है कि घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता। यह परंपरा आज भी लाखों लोगों द्वारा अटूट श्रद्धा के साथ पालन की जाती है। इस दिन लोग पिछले दिन का बचा हुआ ठंडा भोजन (बासी) खाते हैं, जिससे इस त्योहार का नाम “बासौदा” पड़ा है। यह प्रथा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी समझदारी भरी है। गर्मी के मौसम में आने वाले इस त्योहार के दिन चूल्हा न जलाने से घर का तापमान कम रहता है और बीमारियों के फैलने का खतरा भी कम होता है।
रात 12 बजे से शुरू हुआ पूजा का क्रम-
भरतपुर के शीतला माता मंदिर में भीड़ से बचने के लिए, भक्तों ने रात 12 बजे से ही पूजा-अर्चना शुरू कर दी थी। सुबह तक हजारों की संख्या में महिलाएं मंदिर पहुंचीं, जिससे मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से भर गया। श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए पुलिस प्रशासन ने रात से ही अतिरिक्त बल तैनात किया था। मंदिर के बाहर सड़कों पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु देखे गए, जिन्होंने अपनी बारी का इंतजार करते हुए भजन-कीर्तन में भाग लिया। स्थानीय प्रशासन द्वारा पेयजल और छायादार स्थानों की व्यवस्था की गई थी, ताकि गर्मी में भक्तों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
स्वास्थ्य और कल्याण की देवी-
शीतला माता को स्वास्थ्य और कल्याण की देवी के रूप में पूजा जाता है। विशेष रूप से, उन्हें चेचक, खसरा और अन्य संक्रामक बीमारियों से बचाव करने वाली देवी माना जाता है। वर्तमान समय में जब संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ता जा रहा है, शीतला माता की आराधना का महत्व और भी बढ़ गया है। एक स्थानीय पुजारी ने बताया, “शीतला माता की कृपा से न केवल शारीरिक बीमारियां दूर होती हैं, बल्कि मानसिक शांति भी मिलती है। देवी का नाम ही ‘शीतला’ है, जिसका अर्थ है ठंडा या शांत करने वाली। वे हमारे जीवन के तापों को शांत करती हैं।”
समाज में बदलते परिप्रेक्ष्य के बीच जारी है परंपरा-
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकास के बावजूद, शीतला माता के प्रति लोगों की आस्था अडिग है। यह आधुनिकता और परंपरा के बीच सामंजस्य का एक उदाहरण है, जहां लोग वैज्ञानिक प्रगति का लाभ उठाते हुए भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहते हैं। एक स्थानीय शिक्षक राजेश शर्मा ने इस विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हमारी परंपराएँ हमारी पहचान हैं। शीतला माता की पूजा जैसे रीति-रिवाज हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं। साथ ही, इनमें छिपी प्राचीन ज्ञान और विज्ञान की बातें आज भी प्रासंगिक हैं।”
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श्रद्धा और परंपरा का मिलन-
भरतपुर में शीतला माता की इस भव्य पूजा ने एक बार फिर साबित किया है कि हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता, स्वास्थ्य चेतना और प्राचीन ज्ञान का संगम भी है। जैसे-जैसे समय बदल रहा है, हमारी परंपराओं के मनाने के तरीके भी बदल रहे हैं, लेकिन उनका मूल भाव और महत्व अक्षुण्ण है। शीतला माता की पूजा भारतीय संस्कृति की उस जीवंतता का प्रतीक है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है और आने वाली पीढ़ियों तक भी इसी उत्साह के साथ जारी रहेगी।
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