अर्बन नक्सल और मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी नक्सली !

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शैलेश शर्मा

नक्सलियों को हथियार, पैसा, प्लान, कहां से मिलते? कौन दिलाता है? कानूनी सहायता, मानवाधिकार कैसे और कहां से मुहैया होते है? जो अभी 5 लोग गिरफ्तार हुए हैं उनमें से कुछ लोग पहले भी NDA की सरकार में अरेस्ट हुए थे और आरोप भी साबित हो चुके हैं। 2009 में ग्रीन हंट के दौरान अर्बन नक्सलाइट को नक्सलियों से खतरनाक बताया गया था।

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 2013 में NDA सरकार ने शपथपत्र दिया था जिसमें इन पांच लोगों की गतिविधियों को संदेह के घेरे में रखा गया था। सामाजिक कार्यकर्ता, एडवोकेट, मानवाधिकार कार्यकर्ता, प्रोफेसर और कुछ एनजीओ बारूद की सुरंग बनाने वालों को सांस देकर समाज को दलित , मुस्लिम के नाम पर बांटते रहे हैं और सूडो सेक्युलर पार्टियों को इलेक्शन जीतने की मजबूती दते रहे है। समाज के बांटने के कारण इनी सूडो सेक्यूलर पार्टियों को जी भर के भ्रष्टाचार करने का मौका खूब मिला।

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मीडिया में बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इन नक्सलियों, माओवादियों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करता रहा है। जबकि यही बुद्धिजीवी गिरोह सेकुलरिज्म का चोला ओढ़ के पत्थरबाजों, अलगाववादियों और जेएनयू की वंदना में देश को धोखे में रखता रहा है, इन सबका एजेंडा ये है कि कश्मीर को दे दो , कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था ही नहीं, चीन को डोकलाम में आने दो और भारत का भूभाग धीरे धीरे उसे देते रहो। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी सेना पर लगाकर उसके मनोबल को कमजोर करते रहें हैं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने के शडयंत्र का पत्र मिला है जिसमें माओवादी, कम्युनिस्ट और जेएनयू से तार जुड़ते दिखाई दे रहे हैं। इस घटना की समीक्षा करने से पहले दो उदाहरणों पर प्रकाश डालना जरूरी है। पहला उदाहरण है – कम्युनिज्म का उदय भारत में 1925 में कानपुर में हुआ जबकि मार्क्स वादी कम्युनिस्ट पार्टी के अनुसार इसकी स्थापना 1920 में ताशकंद में हुई थी और हमारे पूर्व प्रधानमन्त्री स्व श्री लाल बहादुर शास्त्री की भी मौत ताशकंद में हुई थी और उनकी मौत पर सवालिया निशान लगते रहें है इसकी पुष्टि कुलदीप नय्यर की किताब से भी होती है जब कि कुलदीप नय्यर साहब विशेष संवाददाता के रूप में शास्त्री जी की यात्रा को कवर करने ताशकंद गए थे। मतलब कम्युनिस्ट पार्टियों की डोर कहीं और  रही है और वहीं से दिशा निर्देश मिलते रहे है।

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दूसरा उदाहरण -1995 में किम डेवी का पुरुलिया में हथियार गिराने का है। भारतीय जांच एजेंसियो के मुताबिक एंटनोव 26 नाम के एक रूसी एयर क्राफ्ट ने 18 Dec 1995 को पुरुलिया में हथियार गिराए।

हैरान कर देने वाली बात है एक विदेशी विमान भारतीय सीमा में आ जाता है और हथियार गिराने से पहले इसी विमान ने वाराणसी हवाई अड्डे पर फ्यूल भी लिया अभी तक जांच एजेंसियों और भारत की केंद्र सरकार को खबर भी नहीं। हथियार पुरुलिया में गिरा दिए जाते है फिर इसी विमान को बॉम्बे एयरपोर्ट पर उतार भी लिया जाता है। हथियारों के एजेंट पीटर ब्लीच और चालाक दल के 6 सदस्य के साथ किम डेवी को पकड़ लिया जाता है। मजे की बात किम डेवी बॉम्बे एयरपोर्ट से गायब भी हो जाता है और पूर्व वर्ती कांग्रेसी सरकार कोई खबर नहीं होती, ये बात कुछ हज़म नहीं हुई की एक बाहरी विमान ने ईंधन लिया , हथियार गिराए और किम डेवी गायब भी हो गया , ये कैसे संभव ही सकता । किम डेवी के प्रत्यपर्ण की कार्रवाई डेनमार्क से चल रही है। 29 अप्रैल 2011 टाइम्स नाउ के इंटरव्यू में किम डेवी ने माना कि हथियार माविवादियों के लिए थे।

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अब घटनाओं को जोड़िए इंटरनेशनल गिरोह और कम्युनिस्ट पार्टी, नक्सलवादी, माओवादी, अर्बन नक्सलवादी, ताशकंद , एंटोनोव 26  एयर क्राफ्ट जो कि रूस का था , किम डेवी। इस कड़ी में कुछ ना कुछ अपरिभाषित है, अधूरा है, संदेह के घेरे में है, इस ” दाल में काले” को वर्तमान सरकार दूर करे जिससे वामपंथ की करतूत से देश को निजात मिले।

प्रधानमंत्री मोदी को मारने की योजना का पत्र जिसमें कम्युनिस्ट विचारधारा वाले अर्बन नक्सली जो की इंटरनेशनल गिरोह से दिशा निर्देश लेते है। कम्युनिस्ट पार्टी, माओवाद, हुरियत, जेएनयू और आतंकवादी इन सबको बाहर से पैसे नहीं मिल पा रहे जिससे ये मारने की योजना बना सकते है।

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कुछ दिन पहले मोदी ने एक मंच से कहा था ये लोग हमें छोड़ेंगे नहीं क्योंकि हवाला बंद, हजारों एनजीओ बंद जिससे इंटरनेशनल गिरोह से पैसे नहीं आ पाते तो पेट में दर्द तो होगा ही। देश के प्रधानमंत्री के मारने का षड्यंत्र इतना सरल नहीं होता जब तक देश की बड़ी पार्टियां शामिल ना हो । ऊपर के उदाहरण से देश की महान और बड़ी पार्टियों के तार और दिशा निर्देश इंटरनेशनल गिरोह से मिलते रहे है। जांच में सब पता चल जाएगा कि वो कौन से बड़े राजनीतिक दल है जिनके तार वर्तमान प्रधान मंत्री के मारने की योजना में शामिल हो सकते हैं।

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 बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी के सुप्रीमो चीन के दूतावास में चुपचाप जाते है फिर उन्ही पार्टी कहती है वो नहीं गए, जब फोटो मीडिया में तब कहते हम गए , वो डोक्लाम की स्थिति जानने के लिए। डोकला म की जानकारी के लिए विदेश मंत्री मिलना चाहिए , सरकार से मिलना चाहिए ना की चीनी दूतावास में।

अभी हाल में ही राहुल गांधी जी का चीनी राजदूत प्रेम दिखा वो राहुल जी को सी ऑफ करना चाहते थे पर सरकार ने अनुमति नहीं दी लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता निकाला और मानसरोवर के दर्शन चीन के बिना नहीं हो सकते। ये चीनी प्रेम क्यों? क्या कोई खिचड़ी तो नहीं पकाई जा रही। ये अर्बन नक्सली का जाल कुछ और संकेत तो नहीं दे रहा है। इसी अर्बन नक्सली का समर्थन कांग्रेस पार्टी क्यों कर रही है? जांच पड़ताल के बाद ही पता चलेगा अर्बन नक्सली के तार कहां तक फैले हुए ? चीनी प्रेम का मानसरोवर हिलोरे ले रहा है।

“ये लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में सभी सूचनाएं लेखक द्वारा दी गई हैं, जिन्हें ज्यों की त्यों प्रस्तुत किया गया हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति दस्तक इंडिया उत्तरदायी नहीं है।”

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