राजनीतिक जनित हैं किसानों की समस्याएं !

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किसान मार्च में कवि कुमार विश्वास की लिखी पंक्तिया बखूबी काम में आ रही हैं... (सोर्स -ट्वीटर)

अजय चौधरी

किसान एक बार फिर दिल्ली में है। इनकी समस्याएं बहुत हैं, लेकिन कुछ समस्याएं राजनीतिक जनित भी है जैसे किसान फसल बीमा योजना जिसे किसानों के भले के लिए लागु किया गया लेकिन इससे शायद ही किसी किसान का भला हो पाया, किसान बस प्रिमयम देते रहे और उधर उनकी फसल को नुकसान हुआ तो उसकी भरपाई हुई ही नहीं। फसल बीमा योजना के अधिकतर मामले ऐसे ही हैं, अपवादों को छोड दें तो ये राजनीतिक जनित समस्या है। जो हाल ही में हुई है।

जिसका मतलब यही है कि सरकार ने कोरपोरेट कंपनियों को किसानों को भी लूटने का लाईसेंस जारी कर दिया है। किसान को तो ये भी नहीं पता कि बीमा कंपनी तक कैसे पहुंचा जाए। बीमा कंपनी तक यदि कोई पहुंच भी जाए तो वो 24 घंटे के अंदर नुकसान की जानकारी देने का नियम बता देती है। आग लगे तो किसान नुकसान की जानकारी तुरंत भी दे दे लेकिन कैसे वो किसान प्राकृतिक आकलन का नुकसान 24 घंटे में कर सकता है।

सरकार कर्जमाफी कर दिखा देती है, कि देखिए हम किसानों के साथ खडे हैं, बैंको से लिया गया कर्ज माफ किया जाता है। जिससे बैंको को तो हानी होती ही है साथ ही किसान फिर से कर्ज ले लेता है। बैंक नहीं देता तो साहूकार दे देता है। अब बैंक का कर्ज तो सरकार माफ भी कर दे लेकिन साहुकार का कर्ज और उसका ब्याज कौन माफ करे?

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समस्या यही है कि असल समस्या पर कोई बात ही नहीं करना चाहता। असल समस्या है “एमएसपी” अंग्रेजी में मिनिमम सपोर्ट प्राइस और हिंदी में न्यूनतम समर्थन मूल्य कहते हैं इसे। जिसे फसल ही लागत के आधार पर तय किया जाना चाहिए। फसल की लागत में जमीन, खाद्य, दवाईयां, मजदूरी, बिजली, पानी, ट्रैक्टर, पशु , फसल मंडी तक पहुंचाने का किराया आदि आता है। इन सब को जोडकर एमएसपी का मूल्य तय किया जाना चाहिए। किसान एमएसपी का मूल्य बढाने की मांग करते रहते हैं ताकी कम से कम उनकी लागत तो निकल पाए। जिन फसलों का मूल्य बढ़ा भी दिया जाता है तो उन्हें उस मुल्य पर खरीदने के लिए कोई राजी ही नहीं होता। बेचरा किसान आखिर में उसे कम दामों पर बेचने को मजबूर होता है। खरीद किस कीमत पर हुई सरकार इसकी कभी जांच ही नहीं करवाती।

 समस्या का हल इसी में है कि किसानों को बस उनकी फसल का उचित मूल्य मिल जाए तो वो फिर ना तो कर्ज लेने को और न ही आत्महत्या करने को मजबूर होंगे। लेकिन इतना हल भी हमारे राजनेता नहीं कर पाते या करना नहीं चहाते। चाहते तो क्या कुछ नहीं हो सकता। डर ये भी है कि किसान अगर पढ़ लिख गया, उसके हाथ में दो पैसा आ गया तो तुम्हे कौन पूछेगा? तुम्हारी बातों में कौन फसेगा?

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दिल्ली में किसान डेरा डाले हैं, संसद भवन की तरफ मार्च कर रहे हैं, ये मार्च उनकी तरफ ही जा रहा है, जिन्हें वो खुद चुनकर वहां तक भेजते हैं, आज वो उनके दर पर ठोकर खा रहे हैं, क्योंकि किसान भी जानते हैं कि नेताओं का उनके दर पर हाथ फैलाने का समय फिर से आने वाला है, मध्यप्रदेश में हो लिया, राजस्थान में चल रहा है। किसान की उम्मीद बस इतनी है कि नेता के उनकी झोपड़पट्टी की तरफ आने से पहले और वहां खाना खाने का ढोंग करने से पहले वो उनसे अपनी कुछ जायज मांगे मनवा ले।

हमें सोचना होगा कि क्यों किसान मुद्दा होकर भी कभी मुद्दा नहीं बन पाते, इतना अगर सोच पाओगे तो आज के ये प्रायोजित मुद्दे धुंधले नजर आने लगेगें।

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