2018 में दिल्ली मेट्रो ने रोजाना खोए 2.23 लाख यात्री, पर्यावरण को हुआ भारी नुकसान

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Source- Wikipedia

अजय चौधरी

साल दर साल शहरों से लेकर देश तक की आबादी बढ़ती है। जाहिर है दिल्ली की आबादी में भी इजाफा हुआ होगा। बढ़ती आबादी से हमारी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली पर बोझ बढ़ता जाता है। लेकिन दिल्ली मेट्रो के साथ साल 2017-18 में ठीक इसके विपरीत हुआ। मेट्रो की सालाना रिपोर्ट में ये साफ हो गया कि किराया बढ़ने के बाद दिल्ली मेट्रो ने रोजाना करीब 2.23 लाख यात्रियों को खोया। मेट्रो में साल 2016-17 में जहां रोज करीब 27.61 लाख यात्री सफर करते थे उनकी संख्या 2017-18 के आंकड़ों के अनुसार घटकर 25.38 लाख के करीब रह गयी।

ये सब तब हुआ जब 2018 में मेट्रो की कई नई लाइनों की शुरुआत हुई। उनमें कई नए यात्री बढ़े। इन नए यात्रियों और दिल्ली एनसीआर में जो आबादी बढ़ी और उसने जो मेट्रो में सफर किया उन्हें हटा दिया जाए तो मेट्रो ने रोजाना 2.23 लाख से कहीं ज्यादा यात्रियों को खोया है। ये बात दिल्ली मेट्रो के अधिकारी भली भांति समझते हैं। मेरा मानना है ये संख्या 10 लाख यात्री प्रतिदिन के करीब ही होगी। इससे मेट्रो की आय में बढ़ी तो क्या होगी घटी ही होगी।

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आय को एकतरफ रख दें तो मेट्रो के किराए से ज्यादा महत्वपूर्ण साफ हवा है, जो हर नागरिक का अधिकार है। लाखों की संख्या में जिन यात्रियों ने मेट्रो के सफर को अलविदा कहा उन्होंने अपनी कार और बाइक से ही अपना सफर पूरा करना अपने बजट में समझा होगा। मुझे नहीं लगता कि 10 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने लचर डीटीसी की बस सर्विस की तरफ़ रुख किया होगा। नतीजतन दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफिक के बोझ के साथ कितना प्रदूषण मेट्रो के इस कदम से बढ़ा होगा इसपर प्रबुद्ध वर्ग और प्रशासन ने कभी चर्चा की ही नहीं। हो सकता है चुनाव को ध्यान में रखते हुए जीएसटी की स्लैब की तरह मेट्रो के किराए को फिर घटा देने की घोषणा कर दी जाए लेकिन इसे पर्यावरण के प्रति हमारी सरकारों की चिंता तो कतई नहीं कहेंगे।

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