CBSE के इस बार के रिजल्ट में दरअसल एक बड़ा अंतर देखने को मिला है, वो अंतर है प्रैक्टिकल और थ्योरी मार्क्स के बीच का अंतर। बहुत से मामले में देखने में आया कि स्कूल ने जिन छात्रों के प्रैक्टिकल में कम अंक दिए थे वो थ्योरी में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। ऐसे में कहा जा सकता है कि स्कूलों से बच्चों की काबिलियत को पहचानने में भारी भूल हुई है, या फिर अध्यापक अपनी पंसद के आधार पर छात्रों को प्रैक्टिकल में अंक दे रहे हैं, इनमें से जो भी वो रिजल्ट के लिए और छात्रों को लिए कतई ठीक नहीं है, इसलिए अब इस मामले को लेकर सीबीएससी एक्शन में आया है।
सीबीएसई ने स्कूलों को निष्पक्षता बरतने का दिया आदेश-
सीबीएसई ने स्कूलों को कड़े शब्दों में निष्पक्षता और सटीक तरीके से मूल्यांकन कर छात्रों को प्रैक्टिकल के अंक देने की बात कही है। सीबीएसई ने कहा है कि आप इस प्रक्रिया को ठीक करें और अपने पढ़ाने के तरीके में जरुरी बदलाव करें।
कैसे पकड़ में आई कमी-
सीबीएसई ने स्कूलों की इस कमी को एआई तकनीक के माध्यम से पकड़ा है। जिसमें पाया गया कि 500 से अधिक स्कूलों में करीब 50 प्रतिशत छात्रों के थ्योरी और प्रैक्टिकल अंको में बड़ा अंतर है।
रिजल्ट में अंतर आने के पीछे का बड़ा कारण-
इतना अंतर आने के पीछे का कारण स्कूलों के अध्यापकों का मेधावी छात्रों को पहचानने में भूल भी हो सकती है, लेकिन तथ्यों के आधार पर देखा जाए तो छात्रों का स्कूल में हर साल एग्जाम होते हैं तभी वो अगली क्लास में आते हैं, ऐसे में स्कूलों को छात्रों के प्रदर्शन के बारे में पता होता है।
मान लीजिए 12वीं कक्षा में आने से पहले एक छात्र का 11वीं का प्रदर्शन भी अध्यपकों के पास होता है, साथ ही 12 वीं में भी पूरे साल कई तरह के छोटे टेस्ट और एग्जाम भी स्कूलों में होते हैं, ऐसे में इतनी बड़ी भूल स्कूल कैसे कर सकते हैं?
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इस आधार पर ये भी माना जा सकता है कि स्कूल प्रैक्टिकल अंक छात्रों के देने की प्रक्रिया में जानबूझ कर गड़बड़ करते हैं और इसे वो अपना अधिकार समझते हैं। हो सकता है कि जो छात्र अध्यापकों की चाटूकारिता न करता हो उसे कम अंक दिए जा रहे हैं और चाटूकारिता करने वाले कमजोर छात्र का रिजल्ट अच्छा करने के लिए उसे अधिक अंक दिए जा रहे हों।
लेकिन आप अपनी पंसद के आधार पर किसी छात्र का रिजल्ट तो खराब नहीं कर सकते, ये हक स्कूलों के पास नहीं होना चाहिए। इस मामले में स्कूलों को निष्पक्षता बरतनी चाहिए।
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