Hisaab Barabar Review: आज हम आपको एक ऐसी फिल्म के बारे में बताने जा रहे हैं, जो भ्रष्टाचार पर एक तीखी चोट करती है। इस फिल्म का नाम है, ‘हिसाब बराबर’। यह एक ऐसी कहानी है, जो दिखाती है, कि कैसे एक सामान्य इंसान बड़े से बड़े घोटाले को उजागर कर सकता है। यह फिल्म कैसी है, इसकी कहानी क्या है आईए जानते हैं-
किरदार और उनकी दुनिया(Hisaab Barabar Review)-
फिल्म में नील नितिन मुकेश एक अजीबोगरीब राजनेता ‘मिकी मेहता’ के रूप में नजर आते हैं, जो अपने डायलॉग्स में कहते हैं, कि “आम आदमी गधा होता है”। वहीं आर. माधवन हैं राधे मोहन शर्मा, जो एक पूर्व सीए और अब रेलवे टिकट कलेक्टर हैं। उनकी एक ही फिक्स्ड आदत है हर हिसाब को बराबर करना।
कहानी का मोड़(Hisaab Barabar Review)-
राधे मोहन को बैंक में एक छोटी सी गड़बड़ी मिलती है, मात्र 27.50 रुपये का अंतर। लेकिन यही छोटा सा अंतर उन्हें ले जाता है एक बड़े बैंकिंग घोटाले के पीछे। किरती कुलहारी एक इंस्पेक्टर के रूप में इस जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
फिल्म के उतार-चढ़ाव-
निर्देशक अश्वनी धीर ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजेदार थ्रिलर बनाने की कोशिश की है। लेकिन क्या वाकई यह उम्मीद के अनुरूप है? फिल्म में ‘हिसाब बराबर’ शब्द इतनी बार दोहराया जाता है, कि दर्शक थक जाते हैं।
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अभिनय और निर्देशन-
नील नितिन मुकेश और राशमी देसाई ने अपने किरदार में पूरी कोशिश की, लेकिन डायलॉग्स और किरदारों की अजीब प्रस्तुति ने उनकी कोशिश को कमजोर कर दिया। फिल्म में सोशल कमेंट्री इतनी स्पष्ट है, कि दर्शक को लगता है, जैसे उनके माथे पर हथौड़े से मैसेज दे रहे हों। यह फिल्म ऐसे समय में आई है, जब बैंकिंग घोटाले और भ्रष्टाचार चरम पर हैं। हालांकि फिल्म में बहुत संभावनाएं थीं, लेकिन वह उन्हें पूरी तरह नहीं निभा पाईं।
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‘हिसाब बराबर’ एक ऐसी फिल्म है, जो अपने संदेश को बार-बार दोहराती है, लेकिन फिर भी देखने लायक है। अगर आप भ्रष्टाचार विरोधी कहानियों के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है।
