जाना ही था यदि प्रिय ! तुमको

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जाना ही था यदि प्रिय ! तुमको
ये तस्वीर प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल की गई है (सोर्स- गूगल)

जाना ही था यदि प्रिय! तुमको
तो इस मन में आये क्यों थे ?

याद मुझे है, पहले-पहले
जिस आँगन में आप मिले थे।
सच कहती, मन की बगिया में
अरमानों के फूल खिले थे।
तरसाना था तो आंखों में,
काजल बनकर छाये क्यों थे ?
जाना ही था…….. थे।

वह दर्दीला गीत तुम्ही ने
ज़िगर थामकर मुझे सुनाया,
कैसे कहूँ सजन ! अनजाने
उसने नाज़ुक तार हिलाया।
क्यों अब ऐसी खामोशी है,
गीत मिलन के गाये क्यों थे?
जाना ही था…….. थे।

बोलो, ऐसी सुंदर छवि को
बेबस कैसे आज भुलाऊँ,
याद किसी की कैसे होती,
कैसे जग को आज बताऊँ ?
जो अब काँटे बन चुभते हैं,
ऐसे फूल खिलाये क्यों थे ?
जाना ही ता यदि प्रिय ! तुम को
तो इस मन में आये क्यों थे ?
आये क्यों थे ?

 

रचना- स्वर्गीय कवि प्रभुदयाल कश्यप ‘प्रवासी’

स्व. कवि प्रभुदयाल कश्यप
फोटो स्व. कवि प्रभुदयाल कश्यप

कवि परिचय- अपने शब्दों के चयन से वाक्य में कसावट ला देने अथवा उसके अर्थ में चमत्कार पैदा कर देने वाले स्वर्गीय कवि प्रभुदयाल कश्यप ‘प्रवासी’ का जन्म हरियाणा के फरीदाबाद जिले के होडल कस्बे में 2 फरवरी,1931 को आर्थिक ख़स्तगी झेलते एक तप: पूत, तेजोमय एवं आचार-विचार की शुचिता वाले कश्यप-गोत्रीय, ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनकी मृत्यु 19 दिसंबर 2017 उनके स्थायी पते 800 सेक्टर 17 फरीदाबाद में हुई।

शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी) और शिक्षा- स्नातक

व्यवसाय- राजकीय महाविद्यालय फरीदाबाद से हिन्दी-प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत हो स्वतंत्र-लेखन में संलग्न रहे।

प्रकाशित कृतियाँ- कुहरे में कौमुदी-महोत्सव, पूर्वरंग के बाद और गीत-अगीत।

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