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Dastak India > Home > विचार > Women’s Day 2023: संगठित संघर्ष ही महिला उत्पीडन का समाधान
विचार

Women’s Day 2023: संगठित संघर्ष ही महिला उत्पीडन का समाधान

dastak
Last updated: March 7, 2023 5:20 pm
dastak
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Womens day
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Source- Pixels)
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भारत देश कहने को दुनिया का एक बड़ा लोकतान्त्रिक देश है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी वर्ग की देश में राजनीतिक भागीदारी, उनके अधिकारों की सुरक्षा, उसका समाज में सम्मान, उस वर्ग की मत संख्या पर निर्भर करता है। लेकिन देश में महिलाओं की संख्या लगभग आधी होने के बावजूद भी पुरुषवादी समाज ने उनको न तो, समाज में बराबर का सम्मान दिया और न ही उनको देश की विभिन्न संवेधानिक संस्थाओं में बराबर की हिस्सेदारी दी ।

हिंदू धर्म ने मनुवाद को दिया जन्म-

कहने को भारतीय संविधान में लैंगिक समानता का सिद्धांत प्रतिष्ठापित है फिर भी भारतीय समाज में महिलाएँ एक लंबे समय से असमानता, यातना और शोषण का शिकार रही हैं। महिला उत्पीडन का इतिहास बहुत पुराना है सदियों से नारी उत्पीडन का शिकार रही हैं। मनु स्मृति जो लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व लिखी गई थी, इसी ने देश के हिन्दू धर्म में मनुवाद को जन्म दिया जिसने समाज का पूरा तानाबाना बिगाड़ दिया। मनु स्मृति ने ही समाज को वर्ण-व्यवस्था में बांटा, जिसके आधार पर इन्सान को ऊँचे-नीचे वर्ण की पहचान दी गई जिससे समाज में शोषण जन्म हुआ। नारी को भी मनु स्मृति ने दुसरे दर्जे का नागरिक बनाया। समाज में नारी की तुलना में पुरुष को ज्यादा महत्व दिया गया।

ईस्लाम धर्म में तीन तलाक से किया गया महिला शोषण-

इसी प्रकार ईस्लाम धर्म में तीन तलाक, बहू-विवाह प्रथा और बाल-विवाह प्रथा के कारण महिलाओं का शोषण किया गया, उन पर अनेक प्रकार की पाबंदीयां धर्म और सामाजिक परम्पराओं के नाम पर लगा दी गई। उन्हें शिक्षा से वंचित किया गया। नारी को एक मनोरंजन का साधन मात्र माना गया, इसी सोच के कारण राजा अनेक रानियाँ रखते थे। भारत के इतिहास का कोई ऐसा काल नही रहा जिसमे नारी का शोषण न हुआ हो। देश की आजादी से पूर्व व देश की आजादी के बाद महिलाओं के उत्पीडन की रोकथाम और उनकी सुरक्षा के लिए तत्कालीन सरकारों ने अनेक कानून बनाये लेकिन इन कानूनों के बनने के बाद भी उत्पीडन की घटनाओं में लगातार वृदि होती रही है।

दहेज की आग में जलती महिलाएं-

आजादी से पूर्व महिलाओं को सती प्रथा के नाम पर जलाया जाता था और आजादी के बाद से अब तक दहेज के लालच को पूरा करने के लिए जलाया जा रहा है। दहेज प्रथा के कारण माँ-बाप लडकी को अपने ऊपर बोझ मानने लगे जिसके परिणाम-स्वरूप कन्या-भ्रूण हत्या के मामलों में जोरदार वृदि हुई, देश में लिंगानुपात का अंतर बढ़ गया और इस घ्रणित कार्य को करने में सभ्य समाज के कहे जाने वाले पढ़े-लिखे लोग भी पीछे नही हैं।

हरियाणा और पंजाब में तस्करी कर लाई जा रही बहुएँ-

पिछले कुछ दशकों में देश के अग्रणीय कहे जाने वाले राज्य पंजाब और हरियाणा में लिंगानुपात की स्थिति बहुत ही शर्मनाक थी जिसके परिणाम स्वरूप यहाँ विवाह योग्य लडकियों की संख्या में भरी गिरावट आई है। विवाह के लिए अब हरियाणा के युवा बिहार, मध्य-प्रदेश, छतीसगढ़, आसाम,पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से गरीब परिवारों की लडकियों को दलालों के माध्यम से शादी करके ला रहे हैं। जिससे मानव तस्करी जैसी समस्या उत्पन्न हो गई । एन.सी.आर.बी. 2021 की रिपोर्ट के अनुसार मानव तस्करी के कुल 2189 मामले पुलिस दुवारा दर्ज किये गये जोकि गत वर्ष की अपेक्षा 27.7 प्रतिशत अधिक है। इस प्रकार महिलाओं के अपहरण के मामलों में 17.6 प्रतिशत की वृदि हुई है।

सालाना महिलाओं के प्रति अपराध में 15 प्रतिशत से अधिक की हो रही है वृद्धी-

हालाँकि कुछ क्षेत्रो में महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार भी हुआ है ! आज महिलाएं शिक्षित हो रही हैं। वे हर क्षेत्र में अपनी योग्यता भी साबित कर रही हैं। चाहे देश की राजनीती हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, खेल प्रतियोगिताओं हों, या विज्ञान का क्षेत्र महिला हर क्षेत्र में अपनी योग्यता साबित कर रही हैं। लेकिन उनकी सभी क्षेत्रों में भागीदारी उनकी संख्या के अनुपात में बहुत कम हैं। देश में कुछ प्रतिशत महिलाओं के कामयाब होने से हम ये नहीं कह सकते की महिलाओं को समाज में समानता का अधिकार मिल गया है। आज भी देश में महिला उत्पीडन चर्म सीमा पर व्यापत है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में महिलाओं के प्रति अपराध के कुल 4,28,278 मामले दर्ज हुए जिसमें वर्ष 2020 की तुलना में 15.3 प्रतिशत की वृदि हुई। इसी रिपोर्ट के अनुसार कुल रेप के मामले 31,677 दर्ज किये गये यानि प्रति दिन 86 मामले दर्ज हुए हैं और जो दर्ज नही हो पाये उनकी संख्या का कोई अनुमान नही लगाया जा सकता। उनकी संख्या दर्ज मामलो से कई गुणा ज्यादा हो सकती है।

महिलाओं को सुरक्षा दिलाने में असहाय नजर आते हैं आयोग-

देश में कहने को तो महिलाओं के कल्याण और अधिकारों की सुरक्षा के लिए केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों ने बहुत सारी एजेंसीज़, और आयोग बनाये हुए हैं। महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए वर्ष 1992 में केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय महिला आयोग स्थापित किया गया था लेकिन ये आयोग और एजेंसीज़ भी महिलाओं को न्याय दिलवाने में असहाय नजर आते हैं।  इसलिए महिलाएं इन आयोगों में अपनी शिकायत भेजने में अपनी रूचि नही दिखाती। देश में ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाओं की स्थिति बहुत ही दयनीय है उन पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है वो सुबह घर का सारा काम करके खेतो में काम के लिए जाती हैं और फिर शाम को घर आकर फिर घर पर देर रात तक काम करती है। उनके साथ उत्पीडन की घटना होने पर उन्हें, समाज और परिवार की इज्जत का वास्ता देकर चुप रहने के लिए दबाव बनाया जाता है। वे परिवार में ही बहुत कुछ सहती रहती हैं और जब बर्दास्त से बाहर हो जाता है तब वो आत्महत्या करने जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाती है।

महिला आत्महत्या में हो रही है बढ़ोतरी-

एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में लगभग महिला आत्महत्याओं के 82000 मामले दर्ज किये गए, जिसमें 14.6 प्रतिशत घरेलू महिलाएं थी। मानसिक तनाव से ग्रस्त महिलाओं में से 20 प्रतिशत महिलाएं पागलपन का शिकार हो जाती हैं। अशिक्षित महिलाएं कहीं भी अपनी शिकायत तक दर्ज नहीं करवा पाती। इसी प्रकार का हाल शहरी क्षेत्रो में है वहाँ की महिलाएं शिक्षित हैं, कामकाजी हैं वे भी दोहरे काम की शिकार हैं। वो भी सुबह घर का काम करके ही अपने कार्यालयों में जाती हैं और फिर शाम को घर वापस आकर फिर परिवार के लिए कार्य करती हैं। काम के अधिक दबाव का विपरीत असर उनके स्वास्थ पर पड़ता है जिससे वे अनेक प्रकार की मानसिक और शारीरिक बिमारियों का शिकार हो रही हैं।  एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार देश की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया नामक बीमारी से पीड़ित हैं।

रुढ़ीवादी है पुरुष प्रधान समाज की सोच-

कहने को हम आज आधुनिक कहे जाने वाले समाज में रह रहे हैं परन्तु आज भी पुरुष-प्रधान समाज की सोच रुढ़ीवादी है। वो महिलाओं को अपने बराबर नहीं मानता,  आज भी देश की महिलाओं को न्याय पाने के लिए दर-दर भटकना पड़ता है, फिर भी उन्हें न्याय नही मिलता।  इसका एक ताजा उदहारण उतर प्रदेश के हाथरस में सितम्बर 2020 में एक दलित लडकी से हुए सामूहिक बलात्कार और उनकी हत्या का है जो देश की मिडिया में काफी दिनों तक सुर्ख़ियों में छाया रहा था । पीड़ित परिवार ने अपनी बेटी के साथ हुए जुल्मों के खिलाफ आवाज उठाने के कारण बहुत सारी मुसीबतों का सामना किया। मृतका ने अपने आखिरी बयान में दोषी चार युवाओं का नाम बताये और अपने साथ हुए जुल्म की दस्ता दर्ज करवाई। मृतका के भाई ने मीडिया को बताया था की पुलिस शिकायत करने बाद भी पहले दस दिन तक तो दोषियों को गिरफ्तार तक नही किया गया था।

पीड़ित परिवार ने पुलिस पर ये भी आरोप लगाया की उनकी पीड़ित बेटी के मरने के बाद पुलिस ने उनकी सहमति के बिना ही उसका जबरन अंतिम संस्कार कर दिया था। इस मामले में मीडिया को दिए एक बयान प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था की उन्होंने प्रधानमन्त्री से इस बारे में बात की है और अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाई जाएगी। सीबीआई ने अपनी चार्जसीट में उन चारो पर आईपीसी की धारा 376, 376(डी),302 व एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) के तहत आरोप तय किये थे लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस मामले में चार आरोपियों में से कोर्ट ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया। केवल एक आरोपी को आईपीसी की धारा 304 के तहत गैर इरादतन हत्या और एससी/एसटी एक्ट में दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोर्ट के इस फैसले पर देश में एक बार फिर से महिला के अधिकार और उनकी सुरक्षा पर बहस छिड़ी है। इस प्रकार के फैसलों से देश की महिलाओं का हौसला जरुर टूटता है और वो पुलिस थानों और कोर्ट कचहरी में जाने से बचती हैं।

दिल्ली में एक व्यक्ति ने कुत्ते का रेप किया है, हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है?

महिलाओं की मुक्ति का एक ही रास्ता है वो है महात्मा बुद्ध का रास्ता-

देश के पुलिस थानों में महिलाओं की शिकायतों पर कार्यवाही ना होना, मीडिया द्वारा अश्लील विज्ञापनों के माध्यम से महिलाओं की विपरीत छवि प्रस्तुत करना, महिला सुरक्षा के लिए बने कानूनों का ठीक से कार्यवन्तित न करना, कोर्ट ट्रायल के दौरान सम्बन्धित सरकारी विभागों द्वारा ठीक से पैरवी न करना। जाँच अधिकारीयों द्वारा अपराध के तथ्यों को दबाना या उनको घुमा-फिरा कर प्रस्तुत करना। समाज में महिलाओं को भी धर्म और जातियों के आधार पर बांटा जाना अनेक ऐसे कारण हैं जो महिलाओं को न्याय दिलवाने में बाधा हैं। इन्ही कारणों की वजह से देश में महिला उत्पीडन की घटनाएँ बढ रही हैं। अब महिलाओं के सामने एक ही सवाल रह जाता है की आखिर वो न्याय पाने के लिए जाए तो जाए कहाँ? उनकी मुक्ति का एक ही रास्ता है जैसा की महात्मा बुद्ध ने भी कहा है ‘आपो दीपो भव: यानि अपने दीपक आप बने।

आए दिन हो रही सिक्योरिटी गार्ड्स के साथ बदसलूकी, शिक्षित समाज कर रहा दुर्व्यवहार?

महात्मा बुद्ध के इसी उपदेश्य को ध्यान में रखते हुए आज देश की महिलाओं को स्वमं की मुक्ति के लिए स्वमं ही संघर्ष करना पड़ेगा। देश की सभी महिलाएं शिक्षित हों, वे स्वाबलंबी बने। स्वमं की आत्मनिर्भरता ही उनको समाज में मान सम्मान दिलवाएगी। कानून तो समाज में अपराध के प्रति डर बनता है ताकि लोग अपराध करने से बचें। लेकिन महिलाओं के प्रति अपराध तभी कम होगा जब समाज में फैली धर्म और परम्पराओं के नाम पर रुढ़ीवादी सोच में बदलाव लाना होगा और इस परिवर्तन के लिए महिलाओं को धर्म और जातियों की रुढ़ीवादी विचारधारा को त्याग कर संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी पड़ेगी। ताकि सभी संवैधानिक संस्थाओं में उनको उनकी संख्या के अनुपात में भागेदारी मिल सके। इन संस्थाओं में जब इनकी सही मात्र में भागेदारी होगी तभी वो पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलवा सकेगी और महिला उत्पीडन पर रोक लगाने में सफल हो पाएगी।

लेखक- वेदपाल सिंह
(शोधार्थी,पत्रकारिता एक जन संचार विभाग.
मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट रिसर्च एंड स्टडी)

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