US Tariff Demand: अमेरिका ने भारत से लगभग सभी उत्पादों पर लगाए गए टैरिफ को हटाने की मांग की है, सिवाय कृषि उत्पादों के। यह मांग भारत को अपनी व्यापार सुरक्षा खोने का संकेत देती है, जबकि बदले में कोई विशेष रियायत मिलने की संभावना नहीं है। यदि भारत यह मांग स्वीकार करता है, तो यह उसके लिए एक बड़ी व्यापारिक चुनौती होगी, क्योंकि इसमें उसे अपने घरेलू उद्योगों और व्यापारिक सुरक्षा को छोड़ना होगा।
US Tariff Demand भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक तनाव–
CNBC-TV18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार भारत को ‘अन्यायपूर्ण’ व्यापारिक प्रथाओं के लिए आलोचना कर रहे हैं। ट्रम्प ने हाल ही में घोषणा की थी कि 2 अप्रैल से जवाबी टैरिफ लगाए जाएंगे और यह भी स्पष्ट किया था कि भारत को कोई विशेष प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्हाइट हाउस दौरे के दौरान ट्रम्प ने विशेष रूप से भारत के उच्च टैरिफ को एक समस्या के रूप में उजागर किया था। इस प्रकार, अमेरिकी दबाव बढ़ता जा रहा है और भारत को अपनी व्यापार नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
US Tariff Demand वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल की बातचीत-
भारत सरकार के वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और वाणिज्य सचिव से कई बातचीत की है, ताकि इस मुद्दे का हल निकाला जा सके। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका अपने रुख पर कायम है और वह चाहता है कि भारत बिना किसी बड़े प्रतिफल के अपने टैरिफ हटा दे।
भारत के लिए यह स्थिति काफी जटिल है क्योंकि वह अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था और उद्योगों की सुरक्षा को खतरे में नहीं डालना चाहता। पियूष गोयल के अनुसार, इस मुद्दे पर और अधिक बातचीत होने की संभावना है, लेकिन यह देखा जाएगा कि क्या किसी मध्य रास्ते पर सहमति बन पाती है।
US Tariff Demand ऑटो सेक्टर एक महत्वपूर्ण मुद्दा–
भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा विवाद ऑटो सेक्टर को लेकर है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत विदेशी कारों पर आयात शुल्क को तुरंत शून्य करने के लिए तैयार नहीं है। हालांकि, भारतीय सरकार आयात शुल्क को और कम करने पर विचार कर रही है। हाल ही में भारतीय अधिकारियों ने घरेलू ऑटो निर्माताओं के साथ बातचीत की थी, लेकिन फिलहाल शून्य शुल्क का कोई विचार नहीं किया जा रहा है।
भारत के लिए यह एक संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि विदेशी ऑटो निर्माताओं द्वारा भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए यह आयात शुल्क एक महत्वपूर्ण तत्व है। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह विदेशी निवेश को भी आकर्षित करें, जबकि अपने घरेलू उद्योग की रक्षा भी करे।
2 अप्रैल की डेडलाइन-
अब 2 अप्रैल की डेडलाइन के करीब आते हुए भारत पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन वह जल्दबाजी में कोई निर्णय लेने के लिए तैयार नहीं है। सरकार का कहना है कि वह इस मुद्दे पर सभी पहलुओं पर विचार करेगी और तभी कोई ठोस निर्णय लिया जाएगा।
क्या भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में नया मोड़ आएगा?
अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक तनाव के इस नए मोड़ से यह सवाल उठता है कि क्या दोनों देशों के बीच किसी प्रकार की सहमति बन पाएगी? दोनों देशों के व्यापारिक हित अलग-अलग हैं और इस पर समझौता करना आसान नहीं होगा। हालांकि, भारत अपनी दीर्घकालिक व्यापारिक सुरक्षा के प्रति सजग है और वह किसी भी प्रकार के अनावश्यक जोखिम से बचने की कोशिश करेगा।
भारत की सरकार को यह निर्णय करना होगा कि क्या वह अमेरिका के दबाव में आकर अपने टैरिफ हटा देती है या फिर वह इस विवाद को लंबा खींचने का जोखिम उठाती है। इसके साथ ही, भारत को यह भी समझना होगा कि वैश्विक व्यापार के बदलते परिप्रेक्ष्य में उसके लिए क्या सबसे बेहतर है।
ये भी पढ़ें- Sunita Williams की धरती पर वापसी का काउंटडाउन शुरू, जानें कब, कहां और कैसे लौटेंगी नासा की स्टार एस्ट्रोनॉट
अमेरिका की मांग-
अमेरिका की मांग ने भारत के व्यापार नीति को एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा कर दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत किस रास्ते पर चलता है। क्या वह अपने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, या फिर अमेरिका के दबाव में आकर अपनी व्यापार सुरक्षा छोड़ने का फैसला करता है? इसके परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था और व्यापारिक भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
ये भी पढ़ें- चंद्रमा के क्रेटर्स का अनोखा नजारा, ब्लू घोस्ट ने भेजीं अब तक की सबसे क्लियर इमेज, देखें
