जब प्रधानमंत्री का “प्र” हुआ गायब और हो गया “धानमंत्री”

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तस्वीर केवल प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल की गई है...

राकेश पाठक

ये बात हैरान करने वाली थी। इतने बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का प्र गायब हो जाना। अब वो सिर्फ धान मंत्री थे। प्र था ही नहीं। घोर विपदा भयी। ऐसा कैसे हुआ कहाँ खोजें संसद जाना मुहाल हो गया। कैबिनेट की गोपनीय बैठक बुलाई गई। सारे मंत्री जुटे। समस्या बड़ी थी चुनौती ये भी थी कि विपक्ष को पता न चले कि प्र गायब हो गया अब बस धान ही बचा है। इंटेलीजेंस को फुसफुसा के बताया गया पता करो कहां चला गया प्र?? पर प्र नहीं मिला तो नहीं मिला। तीन चार दिन बीते। विपक्ष सवाल उठाने लगा। देश के प्रधानमंत्री संसद नहीं आते। अब कौन समझाए प्रधान बस धान बचे हैं।

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विपत्ति तो थी। किसी ने कहा आपके पास जो प्रश्न आते हैं उसका प्र निकाल लीजिये, प्रधान हो जाएगा मंत्री तो आप वैसे भी हैं। कोई माई का लाल सवाल उठा नहीं सकता उठाएगा तो देख लेंगे। हमारी संस्कारी सेना उससे निपट लेगी। वो मान गए थोड़ी देर सोचा। फिर न कह दिया। पर दिक्कत क्या है? – करीबी ने पूछा

“बहुत दिक्कत है, प्रश्न विपक्ष के हैं, जनता के होते तो दब जाते। ऑन रिकॉर्ड न होता कुछ। पर आप तो जानते हैं सारे प्रश्नों की लिखा पढ़ी होती है। विपक्ष मुद्दा बना लेगा उसके प्रश्न का प्र चुरा लिया गया और कहीं अगर उसे इसका भान भी हो गया कि प्रधानमंत्री उसके प्र से बना है तो सीबीआई जांच की मांग करेगा और आप तो जानते हैं सीबीआई का दिया दर्द पुरवाई की हवा से होता है। इधर बहा उधर पीड़ा शुरू।”

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कृषि मंत्री ने चापलूसी की। आप तो परेशान न होइए। आप धान मंत्री भी रह गए तो देश का बड़ा भला होगा। हम धान को राष्ट्रीय फसल घोषित कर देंगे। आप कहें तो धान पर सब्सिडी आठगुनी कर दें। इससे किसान आपको दुआएं देगा और मुमकिन है कि वोट भी दे दे। और फिर हम कानून बना कर कह देंगे अब से देश में धानमंत्री ही होगा प्रधानमंत्री नहीं। आपमें बड़ा बल है। आपकी फैन फॉलोइंग है कहिये तो जंतर मंतर पर राष्ट्रवादियों की सेना उतार दें जो मांग उठा दे कि कृषि प्रधान देश में कोई प्रधानमंत्री नही बल्कि धानमंत्री होना चाहिए।

उनको बात जंची तो फिर लगा इस कृषिमंत्री का कोई भरोसा नहीं। कहीं ऐसा न हो कि इसके चक्कर में धान मन्तरि का धा भी हाथ से निकल जाए और अपन बस न मंत्री रह जाएं।

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तभी एक नौजवान नेता ने मचल कर कहा- हुजूर क्यों न आप देश की प्रगति का प्र ले लें। इसपर किसी को कोई आपत्ति न होगी। क्योंकि देश पर आपका भी एक नगरिक होने के नाते अधिकार है। आज देश की प्रगति की आपको ज़रूरत है। देश की प्रगति से प्र ले भी लिया तो भला क्या होगा? गति बचेगी। ये अलग बात है कि सद्गति अथवा दुर्गति। यह तो समय पर निर्भर है। आप तो बस अपनी प्रगति का प्र पकड़ें।

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नौजवान नेता की बात धानमंत्री को जंच गई। उन्होंने उसे गले से लगा लिया। तब से अब तक 70 सालों से प्रधानमंत्री आते जाते रहे। पर प्रधान का प्र फिर गायब न हुआ। उस देश के तमाम प्रधान मंत्रियों ने और उनके परिवारों ने खूब खूब प्रगति की। वो बार बार लगातार सत्ता में आते रहे प्रगति होती रही। राष्ट्र अपनी गति से चलता रहा। कभी धर्म की गति, कभी जात की। पर ये सद्गति थी या दुर्गति किसको क्या फर्क पड़ता है?

“ये लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में सभी सूचनाएं लेखक द्वारा दी गई हैं, जिन्हें ज्यों की त्यों प्रस्तुत किया गया हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति दस्तक इंडिया उत्तरदायी नहीं है।”

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