जानें: सरकार क्यों नहीं रोक पाती फेक न्यूज का कारोबार

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फेक न्यूज आज की तारीख में एक आम नाम बन चुका है जिसके जरिए लोगों को बरगलाया जा रहा है और जिसके बेहद गंभीर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। लेकिन आपने सोचा है कि क्यों फेक न्यूज फैलाने वालों पर रोक नहीं लगती। बात तो सब करते हैं इन्हें रोकने की लेकिन ये रोज बढ़ती ही जा रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है हम कुछ तथ्यों के जारिए आपको समझाने की कोशिश करते हैं…

16 नवंबर के इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपती है कि गलत जानकारी देने को लेकर उन्नयासी यानी की 89 वेबसाईटों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। ये खबर संतुष्टी देने वाली है, क्योंकी झूठ फैलने से रोकने के लिए काफी जरुरी है कि ऐसी वेबसाईटों की पहचान हो जो झूठ फैला रही हैं और उनके खिलाफ एफाईआर दर्ज हो। इससे होगा ये कि जो वेबसाईट फेक न्यूज फैला रही हैं उनकी पहचान होगी और उन्हें बंद किया जा सकेगा। इससे मीडिया का एक हिस्सा जो झूठ फैला रहा है वो भी चौकंना हो जाएगा और जांच-परख के बाद ही किसी खबर को आगे बढाएगा।

तो आप सोच सकते हैं इस छोटे से कदम से फेक न्यूज का कारोबार 80 से 90 प्रसेंट तक कम हो सकता है। लेकिन फिलहाल आपको साफ कर दें ये जो 89 एफआईआर दर्ज की गई है ये फेक न्यूज को लेकर नहीं गलत जानकारी देने को लेकर दर्ज करवाई गई हैं। वैसे देखा जाए तो गलत जानकारी भी एक तरह से फेक न्यूज ही है। ये गलत जानकारी थी क्या पहले ये जान लेते हैं फिर आगे बात करते हैं कि सरकार के इतने प्रयासों के बाद भी फेक न्यूज पर रोक क्यों नहीं लग पाती।

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एनएचए यानी की नेशनल हेल्थ एंजेंसी जिसके जिम्मे आयुष्मान भारत योजना है जिसके जरिए गरीबों को मुफ्त ईलाज दिया जाना है। एनएचए भारत सरकार के सवास्थ्य एंव परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन आता है जिसके मंत्री जगत प्रकाश नाडा हैं। तो आप समझ गए होंगे कि ये कार्यवाही सीधे तौर पर भारत सरकार ने ही की है। एनएचए ने ऐसी 89 फेक वेबसाईटों और मोबाईल एप्पलिकेशनस की पहचान की जो आयुष्मान भारत स्कीम के बारे में गलत जानकारी दे रही है। इन वेबसाईटों के मालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है।

ये सब इस योजना के बारे में गलत जानकारी दे रहे थे जैसे आयुष्मान मित्रों की भर्ती, मरीजों का नामांकन कर उन्हें लाभार्थीयों की सूची में शामिल करना। ये भी बताया जा रहा था कि यहां से हायर किए गए आयुष्मान मित्रों को एंमेपेनल में आए अस्पतालों में लगाया जाएगा जो स्कीम के बारे में लोगों को जानकारी देंगे। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मेडिकल सुप्रीडेंट डा. डीके तिवारी ने साफ किया कि आयुष्मान मित्रों के लिए कोई हाईरिंग एजेंसी नहीं है, हमने अपने मौजूदा स्टाफ में से ही इसकी व्यवस्था की है।

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वहीं एनएचए के सीईओ इंदू भूषण की मानें तो ये वेबसाईटें न सिर्फ गलत जानकारी दे रही थी साथ ही योजना से संबधित लाभार्थी कार्ड देना का वादा भी कर रही थी जिससे लोग अस्पताल में मुफ्त ईलाज करा सकें। उन्होंने साफ किया कि इस योजना का लाभ लेने के लिए कोई रजिस्ट्रेशन फीस नहीं है। हम इन वेबसाईटों को लगातार मोनिटर कर रहे थे। इसके लिए एनएचए ने न सिर्फ इन वेबसाईटों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई है बल्कि सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय को इन वेबसाईटों को तुरंत बंद करने के लिए सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय को लिखा है। जिसके मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर हैं। उम्मीद है जल्द ही इन वेबसाईटों को बंद कर दिया जाएगा।

सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय वही मंत्रालय है जो मीडिया पर मोनिटरिंग भी करता है और पीआईबी के जरिए मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को सरकारी मान्यता भी देता है। हमने ये जाना चाहा कि कैसे फेक न्यूज पर रोक लग सकती है और न्यूज वेबसाईटों को मोनिटर करने के लिए भी अधिकारिक तौर पर मंत्रालय की कोई टीम है क्या तो हमें ऐसी कोई जानकारी मंत्रालय की वेबसाईट पर नहीं मिली, लेकिन हमें इलकट्रोनिक मीडिया को मोनिटर करने के लिए एक सेंटर है ये जानकारी जरुर मिली। लेकिन सबसे ज्यादा फेक न्यूज फैलाने वाली फर्जी वेबसाईटों को रोकने और मोनिटर करने के लिए कोई विंग नहीं मिली।

हालांकि पीआईबी की 8 अगस्त 2013 को जारी हुई एक प्रेस रिलीज के अनुसार सरकार की पहलों को ऑनलाईन माध्यमों पर प्रसारित करने के लिए न्यू मीडिया विंग का निर्माण किया गया जिसके लिए 22.5 करोड रुपए का बजट भी पास किया गया। ये विंग अभी तक है यानी कि कांग्रेस सरकार से लेकर मोदी सरकार में भी ज्यों की त्यों चली आ रही है। भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या भले ही तेजी से बढ़ रही हो लेकिन सोशल मीडिया पर कंट्रोल करने के लिए अभी तक कोई विंग बनाने की जरुरत महसूस नहीं की गई है।

पीआईबी जो सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाला पीआईबी जो पत्रकारों और संस्थानों को मान्यता देता है वो क्यों नहीं वेब जर्नलिजिम करने वाले पत्रकारों और संस्थानों की पहचान करता और उन्हें योग्यता के आधार पर मान्यता देता। जो माध्यम आज की तारीख में सबसे ज्यादा पॉपुलर है आप उसे दरकिनार कैसे कर सकते हैं?हमें ये समझना होगा। क्यों सरकार वेब जर्नलिज्म करने वाले लोगों को पत्रकार नहीं मानती। क्यों इन्हें बाकी पत्रकारों की तरह विभिन्न योजनाओं का लाभ और सरकारी कार्यक्रमों का निमंत्रण नहीं दिया जाता। क्या पत्रकारों की छंटनी करने से सरकार का कुछ नुकसान होगा ये भी विचार करने योग्य बात है।

अगर सरकार वेबसाईटों को मान्यता देकर एक लिस्ट जारी कर दे तो फर्जी वेबसाईटों की पहचान करना काफी आसान हो जाएगा। मान्यता का ये सिलसिला केंद्र से चलकर राज्य और जिला स्तर तक की वेबसाईटों तक आना चाहिए। राज्य सरकारों को भी इसके लिए नियम बनाने चाहिए। क्योंकी राज्य और जिला स्तरों पर फैलने वाली फेक न्यूज को भी रोका जा सके और कोई भी मुह उठा कर पत्रकार न बन जाए। फर्जी प्रेस कार्ड बना कर बांटने के भी मामले किसी से छिपे नहीं हैं, फिर कैसे ये प्रेस कार्ड वाले पत्रकार विभिन्न सरकारी महकमों में अपनी धौंस जमाते हैं। यहां फेक न्यूज के साथ साथ हम सही गलत और पत्रकारों के हितों की भी बात कर रहे हैं।

तो आप सोच सकते हैं अगर सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय स्वास्थय मंत्रालय के कहने पर गलत जानकारी देने वाली वेबसाईटों पर कार्यवाही करेगा, अभी की नहीं है तो वो गलत खबर देने वाली वेबसाईटों पर कार्यवाही क्यों नहीं करता। हमारी जानकारी में अबतक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है जिसमें झूठ फैलाने वाली फर्जी न्यूज वेबसाईटों पर कार्यवाही की गई हो। इस बात की पूरी संभावनाएं हैं कि ये फेक वेबसाईटें किसी राजनीतिक प्रोपोगेंडा के तहत चलाई जा रही हों। हमने इस संबध में फेक न्यूज से पर्दा उठाने वाली वेबसाईट SMBH के संचालकों से बात की है उनसे जानते हैं कि ये फर्जी वेबसाईटें किस तरह अपना काम कर रही हैं।

बुहत सारे नामी अखबारों और न्यूज चैनलों के नाम से मिलती जुलती फर्जी वेबसाईटें बना ली जाती है ताकी लोग समझें की ये वेबसाईट भरोसा करने लायक है और फिर इनके जरिए जो झूठ परोसा जाता है वो झूठ आपको दुविधा में तो डालता ही है साथ ही अपके मन में नफरत भरने का भी काम करता है। अगर आप थोडा सा ध्यान से देखें तो इन वेबसाईटों की पहचान करना बेहद आसान काम है और आप फिर उस फेक न्यूज के प्रभाव से बच सकते हैं। ये बाजार में असली और नकली सामान की पहचान करने जैसा ही है। फेक न्यूज सिर्फ इन वेबसाईटों के जरिए ही नहीं फेसबुक, वाट्सएप्प और ट्वीटर के माध्यमों से भी फैलाई जा रही हैं फेसबुक पर भी बहुत सारे ऐसे फर्जी पेज हैं जिनसे ये झूठ किसी न किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाना के लिए फैलाया जा रहा है। झूठ की फैक्ट्री में विभिन्न राजनैतिक दल शामिल हैं।

तो आपको अब ये साफ हो गया होगा कि किस तरह इन वेबसाईटों का इस्तेमाल झूठ फैलाने के लिए किया जाता है। इनके पीछे का मकसद भी धीरे धीरे समझ में आ रहा होगा, और क्यों इनपर रोक नहीं लग रही अगर इनपर रोक लग जाए तो उससे किसका घाटा होगा ये सब आपको ही समझना है और परखना है 

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