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जाती से कोई संपन्न और गरीब नहीं होता

अजय चौधरी

वीर मराठा भी अब आधिकारिक तौर पर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े साबित हो गए हैं। एक एक कर हमारी ये वीर जातियां पिछड़ी साबित होती जा रही हैं और आपने आप को इस वर्ग में लाकर भी गौरवांवित महसूस कर रही हैं। कोई हमारे समाज पर फ़िल्म बना दे तो हम क्या कुछ नहीं कर सकते इन सब से आप भली भांति परिचित हैं। लेकिन जब मामला रोजी रोटी का होता है तो हम सबकुछ बनने को तैयार हो जाते हैं, शादी नहीं होती तो हम जात भी नहीं देखते,बस किसी तरह लड़की मिल जाए। अगर सरकारी नौकरी मिल जाए तो फिर पिछड़े कहलाने में क्या हर्ज। वीर शब्द तो हम अपनी जाति के साथ गाड़ी पर लिखवा लेंगे।

जाना ही था यदि प्रिय ! तुमको

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार किसी भी राज्य में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दे सकते। मौजूदा स्तिथि में महाराष्ट्र में 52 फीसदी आरक्षण है। ऐसे में नियमों के हिसाब से भी और ओबीसी जातियों के विरोध के चलते भी इन्हें ओबीसी में शामिल नहीं किया जा सकता था। इसलिए आरक्षण देने के लिए एसईबीसी(SEBC) एक नई क्लास का निर्माण कर दिया गया। आरक्षण ज्यादा हो गया लेकिन तमिलनाडु का हवाला दे दिया गया जहां 69 प्रतिशत आरक्षण पहले से लागू है।

महाराष्ट्र में मराठा भले ही राजनीतिक रूप से अपना प्रभुत्व रखते हैं। वो राज्य की आबादी के भले ही 33 फीसदी हों। लेकिन पिछड़े होने की हर परिभाषा में वो फिट बैठते हैं। जाती के 65 प्रतिशत लोग कच्चे घरों में रहते हैं। जबकि ये संख्या 30 प्रतिशत होने पर आपको पिछड़ा मान लिया जाता है। राज्य में जातिगत आधार आत्महत्या करने वालों में मराठा ही सबसे ज्यादा हैं विशेषकर किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्या की। ऐसे में हमें सोचना होगा कि ये आरक्षण जातिगत आधार पर होना चाहिए या गरीबी के हिसाब से। क्योकिं जाती से कोई संपन्न और गरीब नहीं होता…

“ये लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में सभी सूचनाएं लेखक द्वारा दी गई हैं, जिन्हें ज्यों की त्यों प्रस्तुत किया गया हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति दस्तक इंडिया उत्तरदायी नहीं है।”

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Dastak India Editorial Team
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